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५५६ / गो. मा. जीवकाण्ड
उसी प्रकार पण्य [ = वस्तुएँ] स्थानीय व्रत और शील के संचय में जुटा हुआ गृहस्थ भी उनके आधारभूत श्रायु श्रादि का पतन नहीं चाहता । यदा कदाचित् उनके विनाश के कारण उत्पन्न हो जायें तो जिससे अपने गुणों में बाधा नहीं पड़े इस प्रकार उनको दूर करने का प्रयत्न करता है । इतने पर भी यदि वे दूर न हो तो जिसमे अपने गुणों का नाश न हो, इस प्रकार प्रयत्न करता है। इसलिए इसके प्रात्मघात का दोष नहीं हो सकता ।"
घरिऊण वत्थमेत्तं परिगृहं छंडिकण प्रवसेसं ।
सगिहे जिरणालए वा तिविहाहारस्स वोसरणं ।। २७९ ।।
गाया ४३६-४७७
जं कुइ गुरुसयासम्म सम्ममालोइऊण तिविहेण ।
सल्लेखणं चत्थं सुतं सिक्खावयं भणियं ॥ २७२॥ [ सुनन्दिश्रावकाचार ]
- वस्त्र मात्र परिग्रह को रख कर और
शिष्य समस्त परिग्रह को छोड़कर अपने ही घर में अथवा जिनालय में रहकर जो श्रावक गुरु के समीप में मन-वचन-काय से अपनी भले प्रकार आलोचना करके पान के सिवाय शेष तीन प्रकार के प्रहार का त्याग करता है उसे उपासकाध्ययन सूत्र में सल्लेखना नामक चौथा शिक्षाव्रत कहा है। 'यह सल्लेखना ही मेरे धर्म को मेरे साथ ले जाने में समर्थ है, ऐसी भावना निरन्तर भानी चाहिए [ पु. सि. उ. श्लोक १७५]
देशविरत के ग्यारह भेदों का स्वरूप
दर्शनिक देशविरत का लक्षण संक्षेप में इस प्रकार है
सम्यग्दर्शन शुद्धः
संसारशरीरभोगनिर्विण्णः ।
पंचगुरु चरण-शरण दर्शनिकस्तत्त्वपथगृह्यः ॥ १३७॥ | रत्नकरण्ड श्रावकाचार ]
- जो सम्यग्दर्शन से शुद्ध है तथा संसार, शरीर तथा भोगों से विरक्त है, पंच-गुरुयों के चरणों की शरण को प्राप्त है अर्थात् प्रर्हन्तादि पंच परमेष्ठियों की भक्ति में लीन है और जो सन्मार्ग में श्राकर्षित है, वह दर्शनिक श्रावक है। यह प्रथम प्रतिमा का स्वरूप द्रव्यानुयोग की अपेक्षा से कहा गया है । चरणानुयोग की दृष्टि से प्रथम प्रतिमा का स्वरूप इस प्रकार है- सामान्यरूप से दर्शनप्रतिमा वाला श्रावक ग्रष्टमूलगुणधारी, सप्तव्यसन त्यागी और सम्यग्दर्शन की रक्षा करने वाला होता है।
शङ्का – प्राठ मूलगुणा कौन से हैं ?
समाधान - एक मत के अनुसार बड़, पीपल, पाकर ( पिलखन ), ऊमर (गुलर) और अंजीर इन पाँच फलों का ( इनके सर अन्य फलों का ) तथा मद्य, मांस और मधु इन तीन मकारों का त्याग करना आठ मूलगुण है। दूसरे मत के अनुसार मद्यत्याग १, मांसत्याग २, मश्रुत्याग ३ रात्रिभोजन त्याग ४, पञ्चफली त्याग ५, पञ्चपरमेष्ठी की तुति ( देव - दर्शन ) ६ जीवदया ७)
१. सर्वार्थसिद्धि ७।२२ ।