________________
५५०/गो. सा. जीवकाण्ड
गाथा ४७६-४७७
निर्मल बुद्धिवाला धावक उस नियमित काल में मर्यादाकृत क्षेत्र से बाहर हिंसा के त्याग से विशेषता सहित अहिमा व्रत को अपने आश्रय करता है ।
वेशावकाशिकं स्यात्काल-परिच्छेदनेन देशस्य ।
प्रत्यहमणुव्रताना प्रतिसंहारो विशालस्य ।।६२॥ [रत्नकरण्डश्रावकाचार]
--दिग्बत में ग्रहण किये हुए विशाल देश का काल की मर्यादा को लिए हुए जो प्रतिदिन घटाना है, वह अणुव्रतधारी श्रावकों का देशानकाशिक (देशनिवृत्ति परक) व्रत है ।।
वसुनन्दि श्रावकाचार में देशत्रत को यद्यपि गुणनत कहा गया है, किन्तु उसका स्वरूप भिन्न प्रकार कहा गया है
वय-भंगकारणं होइ जम्मि देसम्मि तस्थ रिणयमेरा ।
कोरइ गमगरिएयत्ती तं जारण गुणवधयं विवियं ॥२१५॥ बसुनन्दिश्रावकाचार]
-जिस देश में रहते हुए प्रतभंग का कारण उपस्थित हो, उस देश में नियम से जो गमननिवृत्ति की जाती है, उसको दूसरा देशवत नाम का गुणव्रत जानना चाहिए ।
यत्र व्रतस्य भंगः स्याद्देशे तत्र प्रयत्नतः ।
गमनस्य निवृत्तिःया सा देशविरतिर्मता ।।१४१॥ [गुणभूषण श्रावकाचार] —जिस देश में व्रतभंग की सम्भावना हो उस देश में प्रयत्नपूर्वक गमन का त्याग करने से देशत्रत होता है।
शिक्षावत शिक्षावत-जिन व्रतों के पालन करने से मुनिव्रत धारण करने की या मुनि बनने की शिक्षा मिलती है, वे शिक्षाश्रत हैं। यद्यपि उनकी संख्या चार है तथापि उनके नामों में आचार्यों के अनेक मतभेद हैं। वे मतभेद इस प्रकार है ---
प्राचार्य या ग्रन्थ प्रथम शिक्षावत द्वितीय शिक्षाप्रत का नाम
तृतीय शिक्षावत चतुर्थ शिक्षावत
प्रोषधोपवास
सल्लेखना
१ श्रावक प्रतिक्रमण सामायिक
सूत्र सं. १ २ प्रा. कुन्दकुन्द ३ प्रा. स्वामिकार्तिकेय , ४ आ. उमास्वामी
भोगोपभोगपरिमाण प्रोषधोपवास
देशव्रत अतिथिसंविभाग
५ प्रा. समन्तभद्र
देशव्रत
सामायिक
वैयावृत्य