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४२६/गो. सा. जीवकाण्ड
गाथा ३५०-१५१
नाम मात्र दिये जाते हैं। प्राचाराङ्ग, सूत्रकृताङ्ग, स्थानाङ्ग, समवायाङ्ग, व्याख्या-प्रज्ञप्ति, धर्मकथाङ्ग, उपासकाध्ययनाङ्ग, अन्तःकृद्दशाङ्ग, अनुत्तरोपपादिकदशाङ्ग, प्रश्नव्याकरण, विपाकसूत्र, इष्टिवादाड,ये बारह भेद अङ्ग-प्रविष्ट के हैं । सामायिक, चतविशस्तव, वन्दना, प्रतिक्रमण, वैनायक, कृतिकर्म, दशवकालिक, उत्तराध्ययन, कल्पव्यवहार, कल्पाकल्प, महाकल्प, पुण्डरीक, महापुण्डरीक, निषिद्धिका; ये अङ्गबाह्य श्रुत के चौदह भेद हैं।' इन बारह अङ्गों और चौदह प्रकीर्णकों का कथन आगे गाथा ३५६-३६८ में किया जाएगा।
द्वादशाङ्ग के समस्त पदों की संख्या बारुत्तरसयकोडी तेसीवी तहय होंति लक्खाणं ।
अट्ठावण्णसहस्सा पंचेव पवाणि अंगाणं ॥३५०॥ गापार्य-द्वादशाङ्ग के समस्त पद एक सौ बारह करोड़ बयासी लाख अट्ठावन हजार पाँच (११२८३५८००५) होते हैं ।।३५०।।
विशेषार्य--.सोलह सौ चौंतीस करोड तिरासी लाख सात हजार आठसौ प्रठागी अक्षरों का एक मध्यम पद होता है। इस मध्यम पद के द्वारा अङ्गों और पूर्वो का पदविभाग कहा गया है। उपर्युक्त बारह अंगों में ऐसे मध्यम पदों की संख्या बतलाई गई है।
वारससदकोडीनो तेसीवि हर्षति तह य लक्खाई। अट्ठावणसहस्सं पंचव पदाणि सुवणाणे ॥२०॥ अट्ठावणणसहस्सा दोणि य छप्पण्णमेत्तकोडोनी । तेसीविसवसहस्सं पदसंखा पंच सुवरणाणे ॥
[जयधवल पु. १ पृ. ६३ नवीन संस्करण पृ. ८४] -श्र तज्ञान एक सौ बारह करोड़ (छप्पन करोड़ के दुगुने) तिरासी लाख अठ्ठावन हजार पांच पद होते हैं।
शुतज्ञान के कुल अक्षर एक कम एकही प्रमाण हैं (१८४४६७,४४०७३७०,६५५१६१५) । इस संख्या को मध्यम पद के अक्षरों (१६३४८३०७८८८) से भाग देने पर एक सौ बारह करोड़ तिरासी लाख, अट्ठावन हजार, पाँच पद संख्या प्राप्त होती है और ८०१०८१७५ अक्षर शेष रहते हैं। इन शेष अक्षरों से चीदह प्रकीर्णक रूप अङ्ग बाह्य की रचना होती है। इसे गाथा द्वारा कहते हैं
अङ्गबाह्य अक्षरों की संख्या प्रडकोडिएयलक्खा अट्ठसहस्सा य एयसविगं च । पणत्तरि वण्णाप्रो पइण्ण्यागं पमाणं तु ॥३५१॥
२, गो. जी. गा.३३६ व धवल पू.१३
१.गो. जी. गा.३५७८३६७-३६८ | धवन पु.१.११व६६ पृ. २६६ ।