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________________ २४८ गो. मा जीवकाग गाथा १२५ शङ्का-यह कैसे जाना जाता है ? ___समाधान · क्योंकि त्रम जीव मूक्ष्म होते हैं, इस प्रकार कथन करनेवाला आगमप्रमाण नहीं पाया जाता। त्रस जीवों का क्षेत्र उबबादमारगतिन परिच तशमुनिमायाग सतसा तसरणालिबाहिरह्मि य एस्थित्ति जिहि रिपट्टि ॥१९॥ गाथार्थ-- उपपादगत और मारणान्तिक समुद्घातगत त्रमों के अतिरिक्त शेष अस जीव सनाली के बाहर नहीं पाये जाते, ऐसा जिनों के द्वारा कहा गया है ।।१६६।। विशेषार्थ-उपपाद एक प्रकार का है और वह भी उत्पन्न होने के प्रथम समय में ही होता है। विधक्षितभव के प्रथम समय में जो पर्याय की प्राप्ति है वह उपपाद है। प्राणत्याग मरण है, 'अंतः' का अर्थ अवसान है। जिसका अबसान काल है वह 'मरणांतकाल है, अर्थात् वर्तमान भव की स्थिति का चरम अन्तमुहर्त वह मरणान्तकाल है। मरणान्तकाल में होने वाले समुद्रात मारणांतिक समुद्घात हैं उत्तरभव की उत्पत्ति के स्थान तक जीवप्रदेश फैल जाते हैं यह मारणांतिक । समुद्घात का लक्षण है । अपने वर्तमानशरीर को नहीं छोड़कर ऋजुगति द्वारा अथवा विग्रहगति । द्वारा प्रागे जिसमें उत्पन्न होना है ऐसे क्षेत्र तक जाकर शरीर से तिगुणे विस्तार से अथवा अन्य प्रकार से अन्तमुहर्त तक रहने का नाम मारणान्तिक समुद्घात है। मारणान्तिक समुद्घात निश्चय से जहां आगे उत्पन्न होना है ऐसी दिशा के अभिमुख होता है। किन्तु अन्य समुदातों के इस प्रकार एक दिशा में गमन का नियम नहीं है, क्योंकि उनका दशों दिशाओं में भी गमन पाया जाता है। (परन्तु । रा.बा. १/२०११२ में लिखा है कि आहारक व मारणांतिक समुद्घात एक दिशा में होते हैं। शेष । पाँच समुद्घात छहों दिशाओं में होने हैं।) मारणांतिक समुद्घात की लम्बाई उत्कृष्टतः अपने उत्पद्यमान क्षेत्र के अन्त तक है, किन्तु इतर समुद्घातों का यह नियम नहीं है ।५ 'च' शब्द से केवली समुद्घात को भी छोड़कर ऐसा ग्रहण करना चाहिए। उपपाद, मारणान्तिक समुद्घात और केबली समुद्धात इन तीन अवस्थाओं के अतिरिक्त स्वस्थानस्वस्थान, विहारवत्स्वस्थान, वेदना समुद्घात; कषाय समुद्घात, वक्रियिक समुद्घात, तेजस्कशरीर-समुद्घात, पाहारकशरीर समुद्घात इन सात अवस्थाओं को प्राप्त सर्व अस जीव वस नाली में ही पाये जाते हैं, बस नाली के बाह्य लोक में नहीं पाये जाते। एक राजू विष्कम्भ वाली और चौदह राजू लम्बी लोक के मध्य में स्थित अस नाली है। अस नाली की यह अन्वर्थ संज्ञा है। क्योंकि वह नाली के समान है। कहा भी है लोय बहुमझदेसे रुक्खे सारव रज्जुपवरजुवा । चोइसरज्जुत्त गा तसणाली होवि गुरगणामा ॥१४३॥" १. धवल पु. १ पृ. २७२ । २. "उववादो एयविहो । सो वि उप्पण्ण पढमसमए चेव होदि ।" [धवल पु. ४ पृ. २६] । ३. "वित्रक्षितभवप्रथमसमयपर्यायप्राप्तिः उपपादः।" श्रीमदमयचन्द्र सिद्धान्त चक्रवर्ती कृत टीका] ४. "मरण प्रागात्याग: ............जीवप्रदेशामसर्पणलक्षणः ।" श्रिीमदमयचन्द्र सिद्धान्तचक्रवती कृत टीका पृ. ४४४] । ५. धवल पु. ४ पृ. २७ । ६. श्रीमदभयचन्द्र सिद्धान्तचक्रवर्ती कृत टीका । ७. त्रिलोकसार ।
SR No.090177
Book TitleGommatsara Jivkand
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherRaghunath Jain Shodh Sansthan Jodhpur
Publication Year
Total Pages833
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Principle
File Size22 MB
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