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________________ कामार्ग २५६ समाधान- यह कल्पना भी ठीक नहीं है, क्योंकि सबसे जघन्य बादर शरीर से सूक्ष्म नामकर्म के द्वारा निर्मित सूक्ष्म शरीर की अवगाहना असंख्यातगुणी होने से उपर्युक्त कथन में अनेकान्त दोष श्राता है। इसलिए जिन जीवों के बादर-नामकर्म का उदय पाया जाता है, वे बादर हैं और जिनके सूक्ष्म नामकर्म का उदय पाया जाता है, वे सूक्ष्म हैं, यह बात सिद्ध हो जाती है ।" शङ्का - सूक्ष्म नामकर्म के उदय और बादर नामकर्म के उदय में क्या भेद है ? समाधान — बादर नामकर्म का उदय दूसरे मूर्त पदार्थों से आघात करने योग्य शरीर को धारण करता है और सूक्ष्म नामकर्म का उदय दूसरे मूर्त पदार्थों के द्वारा श्राघात नहीं होने योग्य शरीर को उत्पन्न करता है । यही इन दोनों में भेद है। गाथा १८३ शङ्का सूक्ष्म जीवों का शरीर सूक्ष्म होने से ही अन्य मूर्त द्रव्यों के द्वारा आघात को प्राप्त नहीं होता है, अतः मूर्त द्रव्यों के साथ प्रतिघात का नहीं होता मुक्षा नामकर्म के में नहीं मानना चाहिए समाधान -- नहीं, क्योंकि ऐसा मानने पर दूसरे मूर्त पदार्थों के द्वारा आघात को नहीं प्राप्त होने से सूक्ष्म संज्ञा को प्राप्त होने वाले सूक्ष्म शरीर से प्रसंख्यातगुणे हीन अवगाहना वाले और बादर नामकर्म के उदय से बादर संज्ञा को प्राप्त होने वाले बादर शरीर की सूक्ष्मता के प्रति कोई विशेषता नहीं रह जाती है, अतएव उसका भी मूर्त पदार्थों से प्रतिघात नहीं होगा, ऐसी आपत्ति आएगी । शङ्का प्रजाने दो ? समाधान- नहीं, क्योंकि ऐसा मानने पर सूक्ष्म और बादर नामकर्म के उदय में कोई विशेषता नहीं रह जाएगी । शङ्का – सूक्ष्म नामकर्म का उदय सूक्ष्मशरीर को उत्पन्न करने वाला है। इसलिए इन दोनों के उदय में भेद है । समाधान नहीं, क्योंकि सूक्ष्म शरीर से भी श्रसंख्यातगुणीहीन अवगाहना वाले और बादर नामकर्म के उदय से उत्पन्न हुए बादर शरीर की उपलब्धि होती है । 3 इस उपर्युक्त कथन से यह बात सिद्ध हुई कि जिसका मूर्त पदार्थों से प्रतिघात नहीं होता है, ऐसे शरीर का निर्धारण करने वाला सूक्ष्म नामकर्म है और उससे विपरीत अर्थात् मूर्त पदार्थों से प्रतिघात को प्राप्त होने वाले शरीर को निर्माण करनेवाला बादर नामकर्म है । " afratern जीव दो प्रकार के हैं बादर और सूक्ष्म अर्थात् बादर पृथिवीकायिक और सूक्ष्म पृथिवीकायिक | जलकायिक जोव दो प्रकार के हैं बादर जलकायिक और सूक्ष्म जलकायिक | श्रग्निकायिक जीव दो प्रकार के हैं । बादर अग्निकायिक और सूक्ष्म अग्निकाधिक । वायुकायिक जीव दो प्रकार के हैं - बादर वायुकाविक और सूक्ष्म वायुकायिक । १. "बादश्यांद जीव अपज्जन्त्तयस्स जहणिया मोगाणा असंखेज्जगुगा ॥४०॥ पञ्जन्त्रयस्त्र जहणिया श्रोगाहणा श्रसंखेज्जगुणा ||४७ ।। " [. पु. ११ पृ. ५८-५६]। २५० । ३. धवल पु. १ पृ. २५१ । ४. व. पु. १ पृ. २५३ । ५. घ. पु. १ पृ. २६७ । सुहुमरिगोदजीब रिव्वत्ति २. प. पु. १ पृ. २४९
SR No.090177
Book TitleGommatsara Jivkand
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherRaghunath Jain Shodh Sansthan Jodhpur
Publication Year
Total Pages833
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Principle
File Size22 MB
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