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गाथा १५०
प्रासा/१८१ प्राण हैं, यही इन दोनों में भेद है।' पाहार, शरीर, इन्द्रिय, भानपान, भाषा और मनरूप परिणमाने को शक्ति की पूर्णता पर्याप्तियाँ हैं । विषयग्रहणरूप व्यापार की व्यक्ति प्राण हैं । इसप्रकार दोनों में भेद जानना खाहिए।
प्राणों के भेद पंचवि इंदियपाणा मरणवचकायेसु तिणि बलपारा । प्राणापाणप्पारणा पाउगपाणेग होंति दह पारणा ॥१३०।।
गाथार्थ-पाँच इन्द्रिय प्राण, मन-वचन-काय ये तीन बलप्राण, पानप्राण और आयुनाण ये मब दस प्राण होते हैं ।। १३०॥
विशेषार्थ-मूल चार प्रागा हैं—१. इन्द्रियप्राण २. बलप्राण ३, पानपानप्राण ४. प्रायुप्राण ।। इनके अवान्तर दस भेद हो जाते हैं। इन्द्रिय पाँच-स्पर्शन, रसना, घ्राण, चक्ष और श्रोत्र । बल तीनमनोबल, वचनबल, कायबल । प्रायु, श्वासोच्छ्वास, इसप्रकार ये सब मिलकर (५+३+१+१) दस प्राण हो जाते हैं।
उक्त पाँचों इन्द्रियों का एकेन्द्रिय आदि पाँच जातियों में अन्तर्भाव नहीं होता, क्योंकि चक्षुरिन्द्रियावरण आदि कर्मों के क्षयोपशम के निमित्त से उत्पन्न हुई इन्द्रियों की एकेन्द्रिय आदि जातियों के साथ समानता नहीं पायी जाती। उसी प्रकार इन पांचों इन्द्रियों का इन्द्रिय पर्याप्ति में भी अन्तर्भाव नहीं होता, क्योंकि चक्षुरिन्द्रिय प्रादि को आवरण करने वाले कर्मों के क्षयोपशमरूप इन्द्रियों को और क्षयोपशम की अपेक्षा बाह्य पदार्थों को ग्रहण करने की शक्ति के उत्पन्न करने में निमित्तभूत पुद्गलों के प्रचय को एक मान लेने में विरोध आता है, उसीप्रकार मनोबल का मनःपर्याप्ति में भी अन्तर्भाव नहीं होता, क्योंकि मनोवर्गणा के स्कन्धों से उत्पन्न हुए पुद्गल प्रचय को और उससे मनोबलरूप प्रात्मबल को एक मानने में विरोध आता है तथा वचनबल भी भाषापर्याप्ति में अन्तर्भूत नहीं होता, क्योंकि आहारवर्गणा के स्कन्धों से उत्पन्न हुए पुद्गलप्रचय का और उससे उत्पन्न हुई भाषावर्गणा के स्कन्धों का श्रोग्रेन्द्रिय के द्वारा
ग्रहण करने योग्य पर्याय से परिणमन करानेरूप शक्ति की परस्पर समानता का अभाव है। कायबल । का भी भारी रपर्याप्ति' में अन्तर्भाव नहीं होता, क्योंकि वीर्यान्तराय के उदयाभाव और उपशम से
११. "जीवन हेतुत्वं तत्स्थमनपेक्ष्यशक्तिनिष्पत्तिमात्र पर्याप्तिरुच्यते, जीवनहेतवः पुनः प्रारमा इति त्यो दः ।"
(घ. पु. १ पृ. २५७)। २. "माहारशरीरेन्द्रियप्राणभाषामनोऽर्थग्रहण-शक्तिनिष्पत्तिरूपाः पर्याप्तयः विषयग्रहण व्यापार-व्यक्तिरूपाः प्रागाः इति मेंदो ज्ञातव्यः ।" ( स्वा. का, अनु, गा, १४१ टोका पृ. ८० ) । ३. यह गाथा घ. पु. २ पृ. ४२१ पर गा. २३६ है। प्रा. पं. सं. पृ. ५७३ पर गा, २८ है तथा मूसाचार पर्याप्ति अधिकार मा. १५० है, किन्तु 'कायसु' के स्थान पर 'काए' पाठ है और 'दह' के स्थान पर 'दम' है। प्रा. पं. सं. में 'होति' के स्थान पर 'हुति' है । मुद्रित गो. जी. में 'पारणपाण' जो प्रशुद्ध प्रतीत होता है प्रतः धवन आदि के आधार पर 'ग्राणापारणप्पाण' शुष्ठ पाठ रखा गया है । ४. "तिकाले चदुपारणा इन्दियबलमाउआणपाणो य" (वृहद्रव्यसंग्रह गा. ३)।