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________________ १४०/गो, सा. जीवकाण्ड गाथा ६३ विशेषार्थ.--स्वयंप्रभनगेन्द्रपर्वत के परभाग में स्थित त्रसकायिक जीवराशि प्रधानहै , क्योंकि यह राशि इतर कर्मभूमिज जीवों की अपेक्षा दीर्घायु और बड़ी अवगाहनाबाली है। स्वयंप्रभपर्वत के परभाग में स्थित सबसे बड़ी अवगाहना होती है, इस बात का ज्ञान कराने के लिए यह गाथासूत्र है "संखो पुरण बारह जोयणाणि गोम्ही भव तिकोसं तु । भमरो जोयणमेगं मच्छो पुण जोवरण सहस्सो ॥१२॥ - शंख नामक द्वीन्द्रिय जीव बारह योजन की लम्बी अवगाहनावाला होता है । गोम्ही नामक श्रीन्द्रियजीव तीन कोस लम्बी अवगाहनावाला, भ्रमर नामक चतुरिन्द्रियजीव एक योजन लम्बी अवगाहनावाला और महामत्स्य नामक पंचेन्द्रियजीच एक हजारयोजन लम्बी अवगाहनावाला होता है। पद्म अर्थात् एकेन्द्रिय आदि जीवों को उत्कृष्ट अवगाहना का घनफल इस प्रकार है-स्वयंप्रभाचल के बाह्य भाग स्थित क्षेत्र में उत्कृष्ट अवगाहना वाला पद्म (कमल) होता है जो एक कोश अधिक एक हजार योजन ऊंचा और एक योजन मोटा समवृत्त होता है जिसका धनफल प्राप्त करने के लिए त्रिलोक्सार में निम्नलिखित गाथा कहो गई है "बासो तिगुणो परिहो वासचउत्थाहदो कु खेत्तफलं । खेत्तफलं वेहगुणं खातफलं होइ सन्यत्थ ॥१७॥" उत्कृष्ट अवगाहना वाले एकेन्द्रियजीव-कमल का व्यास एकयोजन, परिधि तिगुणी अर्थात् १४३=३ योजन । व्यास की चौथाई १ योजन, व्यास की चौथाई से परिधि को गुणा करने पर । ३४= वर्गयोजन क्षेत्रफल होता है । इस क्षेत्रफन्न को ऊँचाई से गुणा करने पर ४१००० - ७५०१ घनयोजन स्वातफल होता है । इसके प्रभाणांगुल का प्रमाण ७५०१४३६२३८७८६५६= . २७१८५८८४६६२४८ प्रमाणघनांगुल होता है । स्वयंप्रभाचल के बाह्य भाग में स्थित उत्कृष्ट अवगाहनाबाले द्वौन्त्रिय शंख का मुख चार योजन और और लम्बाई १२ योजन है । उसका धनफल प्राप्त करने के लिए ति. प. में निम्नलिखित गाथासूत्र कहा है - व्यासं तावत् कृत्वा, बदनदलोनं मुखार्षवर्गयुतम् । द्विगुणं चर्षिभक्त सनाभिकेऽस्मिन् गणितमाहः ॥५/३१६॥' एदेण सुशेण खेत्तफलमारिणये तेहत्तरि-उस्सेह-ओयणाणि होति ।७३। "पायामे मुह-सोहिय पुणरवि प्रआयाम सहिद मुहभजियं । बाहल्लं रणायवं संखायारट्टिए खेत्ते ॥३२०।। एदेण सुत्तेण बाहल्ले प्राणिदे पंचजोयणपमाणं होदि । पुष्वसाणीव-तहत्तरिभूद-खेत्तफल पंचजोयराबाहल्लेण गुणिवे घरगजोयसारित तिपिएसयपण्णट्ठी होति ॥३६॥ १. व. पु. ४ पृ. ३३ । २. ति. प. पू. ६३६ भाग २ (सोलापुर) 1 ३. प्रामामकदो मुहदलहीसा मुहवासप्रशवग्गजुदा । विगुणा बेहेण हदा संखावत्तस्स खेत्तफलं ।। ३२७ ।। (त्रिलोकसार)! ४. ति. प. अ. ५। ५. ति. प. भाग २ पृ. ६३८, सोलापुर ।
SR No.090177
Book TitleGommatsara Jivkand
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherRaghunath Jain Shodh Sansthan Jodhpur
Publication Year
Total Pages833
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Principle
File Size22 MB
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