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गाथा ६५
गुस्थान / १११
उदय में स्तोक देता है। उससे द्वितीय समय में असंख्यातगुणा देता है। उससे तृतीयस्थिति में संख्यातगुणानिक्षिप्त करता है। इसप्रकार अन्तर्मुहूर्तकाल तक निक्षिप्त करता है। उससे आगे के समय में असंख्यातगुणे दोन प्रदेश निक्षिप्न करता है। आगे अपनी-अपनी प्रतिस्थापनावली को प्राप्त नहीं होने तक विशेष ( चय) होन निक्षिप्त करता हूँ । यहाँ गुणश्रेणी कर्मप्रदेशनिक्षेप का अध्वान स्तोक है, क्योंकि वह सबसे जघन्य श्रन्तर्मुहूर्त प्रमाण है ।
'उससे अधःप्रवृत्तकेयली संयत का गुणश्रेणिकाल संख्यातगुणा है ।।१८७।'
यहाँ भी उदयादि गुणश्रेणी का क्रम पहले के समान ही कहना चाहिए। विशेष इतना है कि गुणश्रेणिप्रदेशनिक्षेप के अध्वान से अधःप्रवृत्त केवली के गुणश्रेणिप्रदेशनिक्षेप का अध्वान संख्यातगुणा है । गुणकार संख्यातसमय है ।
पूर्वं
'उससे क्षीणकषाय वीतरागछथस्थ का गुणश्रेणिकाल संख्यात गुणा है ॥१८८॥
गुणकार संख्यात समय है ।"
'उससे कषायक्षपक का गुणश्रेणिकाल संख्यातगुणा है ।। १८६ ।। '
गुणकार संख्यात समय है ।
'उससे उपशान्तकषायवीतरागच्छध्वस्थ का गुणश्रेणिकाल संख्यातगुणा है ॥ १६०॥ 'उससे कषायजपशामक का गुणश्रेणिकाल संख्यातगुणा है ॥११॥ '
'उससे दर्शनमोहक का गुणश्रेणिकास संख्यातगुणा है ॥ १६२॥ ।
'उससे अनन्तानुबन्धी विसंयोजक कर गुरश्रेणिकाल संख्यातगुरगा है ॥१३॥'
'उससे अधःप्रवृत्तसंयत का गुणश्रेणिकाल संख्यातगुणा है ॥१६४॥ ।'
अधःप्रवृत्तसंयत और एकान्तानुवृद्धि आदि क्रियाओं से रहित संयत इन दोनों का अर्थ एक है ।
'उससे संयतासंयत का गुणश्रेरिखकाल संख्यातगुणा है ।। १२५ ।। '
'उससे दर्शन मोहोपशामक का गुणश्रेणिकाल संख्यातगुणा है ।। १६६ ।।'
सर्वत्र गुणकार संख्यातसमय है । इस प्रकार गुणधेरिनिर्जंग के ग्यारह स्थानों का कथन पूर्ण हुआ 1
गुणस्थानातीत सिद्धों का स्वरूप
विह कम्म वियला सोदोभूदा खिरंजरगा रिगच्चा । श्रमुरणा दिकिच्चा लोयग्गरिवासियो सिद्धा ।। ६६ ।।
१. व. पु. १२ पृ. ८५ ।
२. घबल पु. १२ पृ. ६६-६७ । ३. व. पु. १ पृ. २०० प्रा. पं. सं. अ. १ मा. ३१ ।