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________________ १००/गो. मा. जीवकाण्ड गाथा ६३-६४ असंख्यात गुणहीनपना अविरुद्ध है, इस बात का ज्ञान कराने के लिए आगे का सूत्र कहते हैं वे योग सम्बन्धी कृष्टियाँ अपूर्व स्पर्धकों के भी प्रसंख्यातवें भाग प्रमाण हैं। एक गुणहानि स्थानान्तर की स्पर्धकशलाकाओं के असंख्यातवें भागप्रमाण अपूर्वस्पर्धक होते हैं । पुनः इनके भी असंख्यात भाग प्रमाग गे योग कृष्टियाँ एक स्पर्धक सम्बन्धी वर्गणाओं के असंख्यातवें भाग प्रमाण जानना चाहिए। इस प्रकार यह इस सूत्र का भावार्थ है । इस प्रकार कृष्टियों को करने के लिये अन्तर्महुर्त काल का पालन करने वाले इस जीव के कृष्टिकरणकाल के यथाक्रम समाप्त होने पर उसके बाद अनन्तर काल में जो प्ररूपगगा विशेष है उसका निर्णय करने के लिए आगे का सूत्रप्रबन्ध गाया है-- ___ कृष्टिकरणकाल के समाप्त होने पर अनन्तर समय में पूर्वस्पर्धकों और अपूर्वस्पर्धकों कानाश करता है। जब तक कृष्टिकरण के काल का अन्तिम समय है तब तत्रा पूर्वम्पर्धक और अपूर्वस्पर्धक अविनष्ट म्प से दिखाई देते हैं, क्योंकि उनके असंख्यातवें भागप्रमाण ही सदृश धनवाले जीवप्रदेशों का प्रत्येक समय में कृष्टिकरण रूप से परिणमन उपलब्ध होता है। पूनः तदनन्तर समय में सभी पूर्व और अपूर्वस्पर्धक अपने स्वरूप का त्याग करके कृष्टि रूप से परिणमन करते हैं, क्योंकि जघन्य कृष्टि से लेकर उत्कृष्ट कृष्टि के प्राप्त होने तक उन कृष्टियों में सदृश धनरूप से उनका उस काल में परिणमन का नियम देखा जाता है। इस प्रकार कृष्टिकरणकाल समाप्त हुआ । अब इसके बाद अन्तर्मुहर्तकाल तक कृष्टिगत योगवाला होकर सयोगिकाल में जो अवशेष काल रहा उसका पालन करता है, इस बात का ज्ञान कराने के लिये प्रागे के सूत्र का अवतार हुअा है।' अन्तर्मुहूर्तकाल तक कृष्टिगत योगवाला होता है। यह सूत्र सुगम है । अब कृष्टिगत योग का वेदन करने वाला यह सयोगीकेवली क्या अन्तर्मुहूर्त तक अवस्थित भाव से वेदन करता है या अन्य प्रकार से बेदन करता है? इस तरह इस प्रकार आशंका का निराकरण करेंगे। यथा-प्रथम समय में कृष्टिवेदक कृष्टियों के असंख्यात बहभाग का वेदन करता है। पुनः दूसरे समय में प्रथम समय में वेदी गई कृष्टियों के अधम्तन और उपरिम असंख्यात भागविषयक कृष्ट्रिय अपने स्वरूप को छोड़कर मध्यम कृष्टिरूप से बेदी जाती हैं। इस प्रकार प्रथम समयसम्बन्धी योग में दूसरे समयसम्बन्धी योग असंख्यात मूगहीन होता है। इस प्रकार तृतीय आदि समयों में भी जानना चाहिए । इसलिए प्रथम समय में बहुत कृष्टियों का वेदन करता है, दूसरे समय में विशेषहीन कृष्टियों का वेदन करता है । इस प्रकार अन्तिम समय तक विशेषहीन क्रम के कृष्टियों का वेदन करता है, ऐसा कहना चाहिए। अथवा प्रश्रम समय में स्तोक कृष्टियों का [परमुख ] वेदन करता है, क्योंकि प्रथम समय में अधस्तन और उपरिम असंख्यातवें भागविषयक कृष्टियाँ ही विनाश होती हुईं प्रधानरूप से विवक्षित हैं। दूसरे समय में असंख्यातगुणी कृष्टियों का वेदन करता है, क्योंकि प्रथम समय में विनाश को १. जयधवल मूल पृष्ठ २२८६ ।
SR No.090177
Book TitleGommatsara Jivkand
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherRaghunath Jain Shodh Sansthan Jodhpur
Publication Year
Total Pages833
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Principle
File Size22 MB
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