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________________ ६/गो. सा. जीवकाण्ड गाथा ६३-६४ लोकपूरगा समुद्घात में विद्यमान इस केवली जिन के लोकप्रमाण समस्त जीवप्रदेशों में योगसम्बन्धी अविभागप्रतिच्छेद वृद्धि-हानि के बिना सदृश ही होकर परिणमते हैं, इसलिए सभी जीवप्रदेश परस्पर सदश धनरूप से परिणत होकर एक वर्गणारूप हो जाते हैं । इसलिए यह केवली उस अवस्था में समयोग जानना चाहिए, क्योंकि समस्त जीवप्रदेशों में योगणक्ति के सदशपने को छोड कर बिसदृशपना नहीं उपलब्ध होता, यह उक्त कथन का तात्पर्य है । और यह समयोगरूप परिणाम सूक्ष्म निगोदजीव की (योगसम्बन्धी) जघन्य वर्गरणा से असंख्यात गुणा तत्प्रायोग्य मध्यम वर्गणा रूप से होता है ऐसा निश्चय करना चाहिए । अपूर्व स्पर्धककी विधि से पहले की अवस्था में सर्वत्र अनुभागों के असंख्यात और अनन्तबहुभागों का घात करता है, क्योंकि उसके घात के लिए ही समुद्घात क्रिया का व्यापार होता है, यह उवत कथन का तात्पर्य है । इस प्रकार इस लोकपूरण समुद्घात में विद्यमान केवली जिन द्वारा स्थिति के असंख्यात भागों के घातित होने पर घाल होने से शेष रहा स्थितिसत्कर्म बहुत अल्परूप से स्थित होकर अन्तर्मुहूर्तप्रमाण आयाम वाला होकर स्थित रहता है, इस बात का ज्ञान वाराने के लिये आगे के सूत्र का अवतार करते हैं-- लोकपूरण समुद्यात में कमों की स्थिति को अन्तर्मुहूर्त प्रमाण स्थापित करता है । यह सूत्र मुगम है । अब क्या यह अन्तमुहूर्तप्रमाण स्थिति आयुकर्म की स्थिति के समान है । या संख्यातगुणी है या अन्य प्रकार की है : इस आशंका के होने पर निःशंक करने के लिये इस सूत्र को कहते है - शेष अघातिकर्मों को स्थिति प्रायुकर्म की स्थिति से संख्यातगणी है। इस रामय भी पायुकर्म की स्थिति के समान इन अघातिकर्मों का स्थितिमत्कर्म नहीं होता है, किन्तु उससे संख्यातगुणा ही होता है, ऐसा निश्चय करना चाहिए । यहाँ इस विषय में दो उपदेश पाये जाते हैं, ऐगा कितने ही प्राचार्य कहते हैं । शङ्का-वह कैसे? समाधान-महावाचक आर्यमा थमा के उपदेश के अनुसार लोकपुररण समुद्घात के होने पर प्रायुकर्म की स्थिति के समान नाम, गोत्र और बेदनीयकर्म का स्थिति सत्कर्म स्थापित करता है। महावाचक नागहस्ति श्रमण के उपदेश के अनुसार लोकपूरण समुद्घात होने पर नाम, गोत्र और वेदनीयकर्म का स्थितिसत्कर्म अन्तर्मुहुर्त प्रमाग होता है । इतना होता हुआ भी प्रायुक्रर्म की स्थिति से संख्यासगुणा स्थापित करता है। परन्तु यह व्याख्यान-सम्प्रदायरिंग के विरुद्ध है, क्योंकि चरिणसूत्र में स्पष्टरूप से ही आयुकर्म की स्थिति से शेष अघातिकर्मों की स्थिति संख्यातगुणी निर्दिष्ट की है। इसलिए प्रवाहमान उपदेश यही प्रधान रूप से अवलम्बन करने योग्य है, अन्यथा सूत्र के प्रतिनियत होने में आपत्ति आती है । इस प्रकार इन दण्ड, कपाट, प्रतर और लोकपूर समृद्घातों के स्वरूपविशेष का और वहाँ किये जाने वाले कार्यभदों का निरूपण करके अब इसी अर्थ को उपसंहार रूप से स्पष्ट करते हुए पागे के दो सूत्र कहते है __केवलिसमुद्घात के इन चार समयों में अप्रशस्त कर्मप्रदेशों के अनुभाग को अनुसमय अपवर्तना होती है ।
SR No.090177
Book TitleGommatsara Jivkand
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherRaghunath Jain Shodh Sansthan Jodhpur
Publication Year
Total Pages833
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Principle
File Size22 MB
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