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________________ སྙད] घण्टाकर्णं मंत्र कल्पः अक्षत का मन्त्र "अक्षत पुर्जे जिनवर पद पंकजा सुकृत कुजैरिव चिरंजे भजते । यो नागार्जुन यंत्रं भजते किं कुर्वते हि तस्य वचनागा । " ॐ ह्रां ह्रीं ह ह्रीं ह्रः । अक्षतान् समर्पयामि । यह कहते हुए 'अक्षत' ( चावल ) समर्पित करें। पुष्प का मन्त्र "पुष्पै कलिः कुल कलि सद्यः । भव्यं चंपक जातिकैः । "यो नागार्जुन यंत्रं भजते कि कुर्वते हि तस्यं वचनागाः ।" ॐ ह्रां ह्रीं ह्रौं ह्रः पुष्पं समर्पयामि । यह कहते हुए 'पुष्प' समर्पित करें। चरू का मन्त्र "हृष्यै हर्ष करे रसनानां । नाना विष प्रिय मोदकादीनां । यो नागार्जुन यंत्रं भजते किं कुर्वते हि तस्य वचनागाः । " ॐ ह्रां ह्रीं ह्र ह्रौं ह्रः ॥ च समर्पयामि । यह कहते हुए चरू (अनेक प्रकार के मिष्ठान ) समर्पित करें । दीप का मन्त्र बुद्धं । दहि कर्मणि माकवि खंडे | भजते कि कुर्वते हि तस्य वचनामा: ।" दीपेदि प्रकरै यो नागार्जुन यंत्रं ॐ ह्रां ह्रीं ह्रहः । ati प्रदर्शयामि । यह कहते हुए दीपक प्रदर्शित करें।
SR No.090176
Book TitleGhantamantrakalpa
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages88
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Worship, & Worship
File Size3 MB
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