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________________ - - करनेसें जो क्रिया लगती है वह अप्रत्याख्यानिकी क्रिया १० (दिट्ठि) जो अशुभ दृष्टीसें देखना सो दृष्टीकी क्रिया ११] (पुद्धिअ) जो रागादिकरों कातिचिनार के श्री शानिक अंगका स्पर्श करना सो स्पृष्टीकी क्रिया १२ (पाडुच्चिर) जो अपने मनसे स्वपरका बुरा विचारना सो पातीत्यकीक्रिका १३ ( सामंतोवणी) अपना अश्व प्रमुखकी प्रशंसासें हर्ष करना सो अथवा दुध दही घी आदिके भाजन खुला रखनेसें उसमें जो त्रसआदि जीवपडकर मरे उससे लगे सो सामंतोपनिपातीकी क्रिया १४ (नेसस्थि) नैशस्त्रकी क्रिया १५ ( साहस्थि) स्वस्तिकी क्रिया १६ ॥ २३ ॥ आणवणिविआरणिआ अणभोगाअणवकंखपञ्चइआ। अन्नापओगसमुदा-णपिज्जदोसेरिआवहिआ२४ | (आणणि ) जो जीव अजीवको लाने लेजानेसें क्रिया लगे उसको आनयनिकी क्रिया कहते है १७ (विआरणिआ) जो जीव अजीवको विदारनेसें विदारणि लगेसो विदारणकी क्रिया १८ (अणभोगा) विना उपयोगसें जो चीज रकम |उठाना रखना तथा हलने चलनेसें जो क्रिया लगे उसे अनाभोगिकी क्रिया कहते है १९ (अणवखपच्चइआ) इस लोक ४ तथा परलोकसें जो विरुद्ध आचरण करना उसे अनवकांक्षप्रत्ययिकी क्रिया कहते है २० (अन्नापओग) दुसरी प्रयोगिकी क्रिया २१ (समुदाण) समुदायकी क्रिया २२ (पिज्ज) माया और लोभ करनेसें जो क्रिया लगे उसे प्रेम प्रेमकी क्रिया कहते है २३ (दोसे) क्रोध और मानसें जो क्रिया लगे उसे द्वेषकी क्रिया कहते है २४ (इरिआवहिआ) रस्ते चल ६ नेसें शरीरके व्यापारसें जो क्रिया लगे उसे इर्यापथिकी क्रिया कहते है २५ पञ्चीसमी क्रिया अप्रमत्तसाधुसैलेके तथा|, सयोगी केवलीपर्यतको भी लगति हैं ॥ २४ ॥ इति आश्रवतत्वम् ॥
SR No.090175
Book TitleJivvicharadiprakaransangrah
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJindattsuri Gyanbhandar Surat
PublisherJindattsuri Gyanbhandar
Publication Year
Total Pages305
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Principle
File Size7 MB
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