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________________ (इग) एकेन्द्रिजाति (वि) वेइन्द्रिजाति (ति) तेरिन्द्रीजाति ( चउ) और चोरिन्द्रिजाति (जाईओ) ऐसे चार जाति नामकर्म यह सब मिलके छासठ (कुखगइ) अशुभ विहायोगति नामकर्म इस नामकर्म से जीव गधेकी नाइ चले : सो ६७ (उवघाय) उपघात नामकर्म ६८ (हुतिपावस्स ) वह सब पापके भेद है ( अपसत्थंवण्णचउ) अशुभवर्णादि । चार ७२ (अपढमसंघयणसंठाणा ) प्रथमका संघयनको छोडकर ऋषभनाराच १ नाराच २ अर्धनाराच ३ कीलीका ५ और सेवठा यह पांच संघयन और प्रथमका संस्थान छोडकर न्यग्रोध १ सादि २ कुबज ३ वामन ४ और हुंडक यह | पांच संस्थान सब मिलकर पापतत्त्वका व्यासी भेद हुआ ॥ १९ ॥ पथावरसुहुमअपज्जं साहारणमथिर मसुभदुभगाणि । दुस्सरणाइजजसं थावरदसगंविवज्जत्थं ॥ २० ॥ । (थावर ) स्थावर नामकर्म १ (सुहुम ) सूक्ष्म नामकर्म २ (अपजं) अपर्याप्ति नामकर्म ३ (साहारणं) साशरण नामकर्म ४ (अथिर) अस्थिर नामकर्म ५ (असुभ ) अशुभ नामकर्म ६ ( दुभग्गणि) दुर्भाग्य नामकर्म ७ (दुस्सर) दुःस्वर नामकर्म ८ (अणाइज ) अनादेय नामकर्म ९ ( अजसं) अपयश नामकर्म १० (धावरदसगंविवजत्थं) यह ह स्थावरको दशको ससे विपरित जान लेना ॥ २० ॥इतिपापतत्त्वम् ॥ इंदिअकसायअवय जोगापंचचउपचतिन्नीकमा । किरिआओपणवीसं इमाओताओअणुक्कमसो ॥२१॥ (इंदिअ) इन्द्रियो पांच (कसाय) क्रोधादि कषाय चार (अश्वय) प्राणातिपातादि अव्रत पाँच (जोगा) मनादि
SR No.090175
Book TitleJivvicharadiprakaransangrah
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJindattsuri Gyanbhandar Surat
PublisherJindattsuri Gyanbhandar
Publication Year
Total Pages305
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Principle
File Size7 MB
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