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________________ सात कर्मनी स्थितिना रस पातला करे अनंतो संसार खपावीने पातलो करे तथा श्रुत ज्ञाननी आराधनाथी अज्ञान 5 मिटे एवा फल कह्या छे. । माटे वाचना तथा भणवानो घणो उद्यम करयो केमके आज पांचमा आरामा कोइ केवली नथी तथा मनपर्यवज्ञानी 2 | अने अवधिज्ञानी पण नथी एक मात्र श्रुतज्ञान तेहिज आगमनो आराधक छे. यतःकत्थ अम्हारिसापाणी, दुसमादोस दूसिया। हायणा हाकहं हुंता, नहुँ तो जइ जिणागमो ॥१॥ __अर्थ-हे भगवंगा सरिका आगीतीश. तिक्षात जे में आ दुसम पंचमकालमां अवतार लीधो. हा-इति है खेदे, अमे अनाथ छु जो जिनराजना कहेला आगम न होत तो आज सुंथात एटले आज आगमनोज आधार छे माटे | आगम अने आगमधर जे बहुश्रुत तेनो घणो विनय करवो आगममां विनयनुं फल ते सांभलq अने सांभलवार्नु फल ज्ञान छे ज्ञाननुं फल मोक्ष छे एम आगम सांभली लेवा योग्य लेजो अयोग्य छांडजो सद्दणी शुद्ध राखजो सद्दहणा| ते मोक्षनुं भूल छे ए इन्द्रिय सुख तो आ जीवें अनंतीवार पास्या छे एहवी जाति-जन्म-योनी कोइ रही नथी जे आपणा जीवे नही करी होय ए जीवने संसारमा भमता अनंता पुद्गल परावर्तन थया पण धर्मनी जोगवायी मली नही | यभव श्रावककुल निरोगशरीर पंचेंद्रि प्रगट वृद्धि निर्मल एटला संयोग मल्या वली श्रीवीतरागनी वाणीना केहेनारा शुद्ध गुरुनी जोगवाइ पामीने अहो भव्यलोको! तुमे धर्मने बिपे विशेष उद्यम करजो फिरिथी एवी जोगवाइ3 मिलवी दुर्लभ छे माटे प्रमाद करशो नही ए शरीर धन कुटुंब आयुष्य सर्व चंचल छे क्षण क्षण छीजे छे माटे पांच तो हवे मनुष्यभव ।
SR No.090175
Book TitleJivvicharadiprakaransangrah
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJindattsuri Gyanbhandar Surat
PublisherJindattsuri Gyanbhandar
Publication Year
Total Pages305
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Principle
File Size7 MB
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