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________________ महाराज का ह्रदय सहसा ही ममहत हो गया। चलते चलते वे ठिठक गये। एकटक उस तरुण तपस्वी को निहारते रह गये। मन-ही-मन वे सोचने लगे : अरे, स्वर्ग की मन्दार- शय्या त्यागकर यह कौन देवकुमार, मत्यों की पृथ्वी पर ऐसी कठोर तपस्या करने को उतर आया हैं। अपने स्वर्ग में इसे किस सुख की कमी रह गयी ? क्या अपनी देवांगना की केसर - कोपल बाँहों में भी इसे जो चाहा सुख न मिल सका ? जानना चाहता हूँ, इसके मन में ऐसी कौन-सी व्यथा समायी है, जो यह अपनी सोने की तरुणाई को यों मिट्टी में मिला रहा हैं । ... युवा तपस्वी कायोत्सर्ग से फिर काया में लौट आये। उनकी आँखें दूर पर खड़े युगल की ओर उठीं। वीतराग स्थिति के साथ ये सर्व चराचर के अंश रूप राजा-रानी को भी सम्यक दृष्टि से देखते रहे । तपस्वी के चुगल चरणों में नमन कर, प्रदक्षिणा देकर न बहुत दूर, न बहुत पास खड़े रहकर सम्राट किने: “हे आर्य, ऐसी कोमल कुमार वय में तुमने ऐसा उग्र तप क्यों धारण किया हैं : रत्नों के पलंग पर फूलों की सेजों में क्रीड़ा करने लायक सौन्दर्य और चौवन लेकर, विजन अरण्यों की कण्टक- शय्या पर क्यों उत्तर आवे ही " "इसलिए राजन्, कि मैं अनाथ था! मैंने पाया कि कोई आत्मीय और मित्र यहाँ नहीं है। कोई अपना नहीं है। मुझे पूर्ण सहानुभूति और अनुकम्पा कहीं न मिल सकी। इसी से मैं इस संसार से अभिनिष्क्रमण कर गया।" सुनकर मगधेश्वर गम्भीर हो गये। ऐसे ऋद्धिमान् और कान्तिमान् युवा को किसी ने अपनाया नहीं ? इसे कोई वल्लभ न मिला, कोई स्वामी न मिला ... हो नहीं सकता । कान्तार के काँटों और कंकड़ों में इसने आश्रय खोजा है। लड़का बहुत नादान मालूम होता है। महाराज करुणा से कातर हो आये । "संयतिनू, ऐसे सौन्दर्य और वैभव को किसी ने अपनाया नहीं ? उसे स्वयंनाथ सर्वनाथ 47
SR No.090168
Book TitleEk aur Nilanjana
Original Sutra AuthorN/A
AuthorVirendrakumar Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year
Total Pages156
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Story
File Size2 MB
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