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________________ १६५६ एसा चेव सत्तमगमग सरिसा वत्तव्वया । णवरं भवादेसेणं-दो भवग्गहणाई कालादेसेणं-जहणेण तिणि पलिओवमाई पुव्यकोडीए अब्भहियाई, उक्कोसेण वि तिण्णि पलिओवमाइं पुव्वकोडीए अब्भहियाई, एवइयं कालं सेवेज्जा, एवइयं कालं गतिरागतिं करेज्जा । (९ नवमो गमओ) -विया. स. २४, उ.२०, सु. ४१-५० ५७. पचिदिय तिरिक्खजोणिए उववज्र्ज्जतेषु भवणवासि देवाणं उववायाइ वीसं दारं परूवणं प. भंते! जइ देवेहिंतो उववज्जंति- किं भवणवासिदेवेहिंतो उवयति जाब वेमाणियदेवेहिंतो उववज्जति ? उ. गोयमा ! भवणवासिदेवेहिंतो वि उववज्जति जाव वैमाणियदेवेहिंतो वि उववति । प. भंते ! जड़ भवणवासिदेवेहिंतो उववज्जति-किं असुरकुमार भवणवासिदेवेहिंतो उववज्जंति जाव थणियकुमार भवणवासिदेवेहिंतो उववज्र्ज्जति ? उ. गोयमा ! असुरकुमार जाव थणियकुमारभवणवासि देवेहिंतो उबवज्जति। प. असुरकुमारे णं भंते । जे भविए पचिदियतिरिक्ख जो उववज्जित्त से णं भंते! केवइयं कालट्ठिईएसु उववज्जेज्जा ? उ. गोयमा ! जहणणेणं अंतोमुहुत्तट्ठिईएसु उक्कोसेणं पुव्यकोडी आउएस उववज्जेज्जा । असुरकुमाराणं लद्धी नवसु वि गमएसु जहा एयरस पुढविकाइएसु उववज्जमाणस्स भणिया । णवरं भवादेसेणं जहण्णेणं दोणि भवग्गहणाई उक्कोसेणं अट्ठ भवग्गहणाई । उववाय ठिई संदेह च सव्वत्य उबउंजिऊण जाणेज्जा । (१-९) नागकुमाराणं जाव थणियकुमाराणं एसा चेव वत्तव्वया, णवरं-ठिई संवेहं च उवउंजिऊण जाणेज्जा (१-९) - विया. स. २४, उ.२०, सु. ५१-५५ उववज्जं सु वाणमंतर ५८. पंचिंदियतिरिक्खजोणिए देवाणं उदवाया वीसं दारं पलवणंप. भंते! जइ वाणमंतर देवेहिंतो उपवज्जति किं पिसाय वाणमंतर देवेहिंतो उववति जाय गंधव्य वाणमंतर देवेहिंतो उयवज्जति ? उ. गोयमा ! पिसाय वाणमंतरदेवेहिंतो वि उववज्र्ज्जति जाव गंधव्य वाणमंतर देवैर्हितो वि उववज्जति । द्रव्यानुयोग - ( ३ ) इसका सप्तम गमक के समान सम्पूर्ण कथन करना चाहिए। विशेष-भवादेश से दो भव ग्रहण करता है। कालादेश से - जघन्य पूर्वकोटि अधिक तीन पल्योपम और उत्कृष्ट भी पूर्वकोटि अधिक तीन पत्योपम जितना काल व्यतीत करता है और इतने ही काल तक गमनागमन करता है। (यह नीचां गमक है) ५७. पंचेन्द्रिय तिर्यञ्चयोनिकों में उत्पन्न होने वाले भवनवासी देवों के उपपातादि बीस द्वारों का प्ररूपण प्र. भन्ते यदि देवों से आकर ये (संज्ञी पंचेन्द्रिय तिर्यञ्चयोनिक) उत्पन्न होते हैं, तो क्या वे भवनवासी देवों से आकर उत्पन्न होते हैं यावत् वैमानिक देवों से आकर उत्पन्न होते हैं ? उ. गौतम ! वे भवनवासी देवों से भी आकर उत्पन्न होते हैं यावत् वैमानिक देवों से भी आकर उत्पन्न होते हैं। प्र. भन्ते ! यदि वे (संज्ञी पंचेन्द्रिय तिर्यञ्च ) भवनवासी देवों से आकर उत्पन्न होते हैं, तो क्या वे असुरकुमार भवनवासी देवों से आकर उत्पन्न होते हैं यावत् स्तनितकुमार भवनवासी देवों से आकर उत्पन्न होते हैं ? उ. गौतम ! वे असुरकुमार यावत् स्तनितकुमार भवनवासी देवों से आकर उत्पन्न होते हैं। प्र. भन्ते ! असुरकुमार जो पंचेन्द्रिय तिर्यञ्चयोनिकों में उत्पन्न होने योग्य है तो भन्ते ! वह कितने काल की स्थिति वाले पंचेन्द्रिय तिर्यञ्चों में उत्पन्न होता है ? उ. गौतम ! वह जघन्य अन्तर्मुहूर्त की स्थिति वाले और उत्कृष्ट पूर्वकोटि की स्थिति वाले पंचेन्द्रिय तिर्यज्यों में उत्पन्न होता है। उसके नी ही गमकों में जैसा पृथ्वीकायिकों में उत्पन्न होने वाले असुरकुमारों के लिए कथन किया है वैसा ही समग्र कथन यहाँ भी करना चाहिए। विशेष-भवादेश से जघन्य दो भव और उत्कृष्ट आठ भव ग्रहण करता है। उपपात स्थिति और संवेध सर्वत्र उपयोग पूर्वक समझना चाहिए (१-९) नागकुमारों का यावत् स्तनितकुमारों का कथन भी इसी प्रकार करना चाहिए। विशेष- स्थिति और संवेध उपयोग लगाकर जानना चाहिए। (१-९) ५८. पंचेन्द्रिय तिर्यञ्चों में उत्पन्न होने वाले वाणव्यन्तर देवों के उपपातादि बीस द्वारों का प्ररूपण प्र. भन्ते यदि ये (संज्ञी पंचेन्द्रिय तिर्यञ्च) वाणव्यन्तर देवों से आकर उत्पन्न होते हैं, तो क्या वे पिशाच वाणव्यन्तर देवों से आकर उत्पन्न होते हैं यावत् गंधर्व वाणव्यन्तर देवों से आकर उत्पन्न होते हैं ? उ. गौतम ! वे पिशाच वाणव्यन्तर देवों से भी आकर उत्पन्न होते हैं यावत् गंधर्व वाणव्यन्तर देवों से भी आकर उत्पन्न होते हैं।
SR No.090160
Book TitleDravyanuyoga Part 3
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanhaiyalal Maharaj & Others
PublisherAgam Anuyog Prakashan
Publication Year1995
Total Pages670
LanguageHindi, Prakrit
ClassificationBook_Devnagari, Metaphysics, Agam, Canon, & agam_related_other_literature
File Size26 MB
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