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________________ १६१८ सो चेव जहण्णकालट्ठिईएसु उववण्णो, एसा चेव पढम गमग वत्तव्वया, " णवरं - कालादेसेणं जहण्णेणं दसवाससहस्साई मासपुहत्तमन्महियाई, उक्कोसेणं चत्तारि पुव्यकोडीओ चत्तालीसाए वाससहस्सेहिं अब्महियाओ एवइयं कालं सेवेज्जा, एवइयं कालं गतिरागति करेज्जा (२ बिइओ गमओ) सो चेव उक्कोसकालट्ठिईएसु उववण्णो, एसा चेव पढम गमग वत्तव्वया, णवरं - कालादेसेणं जहणणं सागरीयमं मासपुहत्तमन्महियं उक्कोसेण चत्तारि सागरोवमाई चाहिं पुव्वाकोडी अन्महियाई, एवइयं कालं सेवेज्जा, एवइयं कालं गतिरागति करेज्जा (३ तइओ गमओ) सो चेव अपणा जहण्णकालट्ठिईओ जाओ। एसा चैव पढम गमग वत्तव्वया भवादेस पज्जवसाणा भाणियव्वा । नवरं इमाई पंच नाणत्ताई १. सरीरोगाहणा- जहण्णेणं अंगुलपुहुत्तं उक्कोसेण वि अंगुलपुत्तं । २. तिण्णि नाणा, तिणि अण्णाणाई भयणाए, ३. पंच समुग्धाया आदिल्ला, ४-५. ठिई अणुबन्धो य जहणणेणं मासपुहतं, उक्कोसेण वि मासपुहत्तं, कालादेसेणं जहण्णेणं दसवाससहस्साई मासपुहत्त महियाई, उक्कोसेणं चत्तारि सागरोवमाइं चउहिं मासपुहत्तेहिं अब्भहियाई एवइयं कालं सेवेज्जा, एवइयं कालं गतिरागति करेज्जा (४ चउत्यो गमओ) सो चेव जहण्णकालट्ठिएसु उववण्णो, इच्चेवं वत्तव्वया उत्थ गमग सरिसा, वरं - कालादेसेणं जहण्णेणं दसवाससहस्साइं मासपुहत्तमन्महियाई, उक्कोसेणं चत्तालीस वाससहरसाई चउहिं मासपुहत्तेहिं अब्भहियाइं, एवइयं कालं सेवेज्जा, एवइयं कालं गतिरागतिं करेज्जा । (५ पंचमो गमओ ।) सो चेव उक्कोसकालदिठईएम उबवण्णो एसा चैव वत्तव्वया चउत्थ गमग सरिसा, नवर- कालादेसेणं जहणेणं सागरोवमं मासपुहतमन्महियं उक्कोसेणं चत्तारि सागरोवमाई चउहिं मासपुहत्तेहिं अब्भहियाई, एवइयं कालं सेवेज्जा, एवइयं कालं गतिरागति करेजा (६ छट्टो गमओ) सो चेव अप्पणा उक्कोसकालट्ठिईओ जाओ, सो चेव पढमगमग वत्तव्वया भवादेस पज्जवसाणा, द्रव्यानुयोग - (३) वही मनुष्य जघन्यकाल की स्थिति वाले रत्नप्रभापृथ्वी के नैरयिकों में उत्पन्न होने योग्य हो इत्यादि समस्त कथन प्रथम गमक के समान कहना चाहिए। विशेष - कालादेश से जघन्य मासपृथक्त्व अधिक दस हजार वर्ष और उत्कृष्ट चालीस हजार वर्ष अधिक चार पूर्वकोटि जितना काल व्यतीत करता है और इतना ही काल गमनागमन करता है। (यह द्वितीय गमक है) वही मनुष्य उत्कृष्ट काल की स्थिति वाले रत्नप्रभापृथ्वी के मैरयिकों में उत्पन्न होने योग्य हो इत्यादि कथन भी प्रथम गमक के समान जानना चाहिए। विशेष - कालादेश से जघन्य मासपृथक्त्व अधिक एक सागरोपम और उत्कृष्ट चार पूर्वकोटि अधिक बार सागरोपम जितना काल व्यतीत करता है और इतना ही काल गमनागमन . करता है। (यह तृतीय गमक है) वही मनुष्य स्वयं जघन्य काल की स्थिति वाला हो और रत्नप्रभापृथ्वी के नैरयिकों में उत्पन्न होने योग्य हो इत्यादि कथन भी प्रथम गमक के समान भवादेश पर्यन्त कहना चाहिए। विशेष- इन पाँच बातों में भिन्नता है १. उनके शरीर की अवगाहना जघन्य अंगुल पृथक्त्व और उत्कृष्ट भी अंगुल पृथक्त्व है। २. उनके तीन ज्ञान और तीन अज्ञान विकल्प (भजना) से होते हैं। ३. उनके आदि के पीच समुद्घात होते हैं। ४-५. उनकी स्थिति और अनुबन्ध जघन्य मासपृथक्त्व और उत्कृष्ट भी मासपृथक्त्व है। कालादेश से - जघन्य मासपृथक्त्व अधिक दस हजार वर्ष और उत्कृष्ट चार मासपृथक्त्व अधिक चार सागरोपम जितना काल व्यतीत करता है और इतने ही काल तक गमनागमन करता है । (यह चौथा गमक है) वही मनुष्य जब स्वयं जघन्य काल की स्थिति वाला रत्नप्रभापृथ्वी के नैरयिकों की जघन्य स्थिति में उत्पन्न होने योग्य हो इत्यादि कथन भी चतुर्थगमक के समान है। विशेष-कालादेश से जघन्य मासपृथक्त्व अधिक दस हजार वर्ष और उत्कृष्ट चार मास पृथक्त्व अधिक चालीस हजार वर्ष जितना काल व्यतीत करता है और इतने ही काल तक गमनागमन करता है। (यह पाँचवां गमक है) वही (जघन्य काल की स्थिति वाले) मनुष्य उत्कृष्ट काल की स्थिति वाले रत्नप्रभा पृथ्वी के नैरयिकों में उत्पन्न होने योग्य हो इत्यादि कथन चतुर्थ गमक के समान जानना चाहिए। विशेष - कालादेश से जघन्य मासपृथक्त्व अधिक एक सागरोपम और उत्कृष्ट चार मास पृथक्त्व अधिक चार सागरोपम जितना काल व्यतीत करता है और इतने ही काल तक गमनागमन करता है। (यह छठा गमक है।) वही मनुष्य स्वयं उत्कृष्ट काल की स्थिति वाला हो और ( रत्नप्रभापृथ्वी के नैरयिकों में) उत्पन्न होने योग्य हो तो उसका कथन भी प्रथम गमक के समान भवादेश पर्यन्त कहना चाहिए।
SR No.090160
Book TitleDravyanuyoga Part 3
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanhaiyalal Maharaj & Others
PublisherAgam Anuyog Prakashan
Publication Year1995
Total Pages670
LanguageHindi, Prakrit
ClassificationBook_Devnagari, Metaphysics, Agam, Canon, & agam_related_other_literature
File Size26 MB
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