SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 98
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ संयत अध्ययन ८३७ प. परिहारविसुद्धियसंजएणं भंते ! कालओ केवचिर होइ? उ. गोयमा ! जहन्नेणं-एक्कं समयं, उक्कोसेणं-एक्कूणतीसाए वासेहिं ऊणिया पुव्वकोडी। प. सुहमसंपरायसंजएणं भंते ! कालओ केवचिरं होइ? उ. गोयमा !जहन्नेणं-एक्कं समयं, उक्कोसेणं-अंतोमुहुत्तं। अहक्खायसंजए जहा सामाइयसंजए। प. सामाइयसंजया णं भंते ! कालओ केवचिर होइ? उ. गोयमा ! सव्वद्ध। प. छेदोवट्ठावणिया णं भंते ! कालओ केवचिर होइ? उ. गोयमा ! जहन्नेणं-अड्ढाइज्जाई वाससयाई, उक्कोसेणं-पन्नासं सागरोवमकोडिसयसहस्साईं। प. परिहारविसुद्धियसंजया णं भंते ! कालओ केवचिरं होइ? रहा उ. गोयमा !जहन्नेणं-देसूणाई दो वाससयाई, उक्कोसेणं-देसूणाओ दो पुव्वकोडीओ। प. सुहुमसंपरायसंजया णं भंते ! कालओ केवचिर होइ? प्र. भन्ते ! परिहारविशुद्धिक संयत काल से कितने समय तक रहता है? उ. गौतम ! जघन्य-एक समय, उत्कृष्ट-उन्तीस वर्ष कम क्रोड पूर्व। प्र. भन्ते ! सूक्ष्म संपराय संयत काल से कितने समय तक रहता है? उ. गौतम ! जघन्य-एक समय, उत्कृष्ट-अन्तर्मुहूर्त। यथाख्यात संयत सामायिक संयत के समान जानना चाहिए। प्र. भन्ते ! अनेक सामायिक संयत काल से कितने समय तक रहते हैं? उ. गौतम ! सर्वकाल रहते हैं। प्र. भन्ते ! अनेक छेदोपस्थापनीय संयत काल से कितने समय तक रहते हैं? उ. गौतम ! जघन्य-अढाई सौ वर्ष, उत्कृष्ट-पचास लाख क्रोड सागरोपम। प्र. भन्ते ! परिहारविशुद्धिक संयत काल से कितने समय तक रहते हैं? उ. गौतम ! जघन्य-कुछ कम अर्थात् ५८ वर्ष कम दो सौ वर्ष। उत्कृष्ट-कुछ कम अर्थात् ५८ वर्ष कम दो क्रोड पूर्व। प्र. भन्ते ! अनेक सूक्ष्म संपराय संयत काल से कितने समय तक रहते हैं ? उ. गौतम ! जघन्य-एक समय, उत्कृष्ट-अन्तर्मुहूर्त। यथाख्यात संयत सामायिक संयत के समान जानने चाहिए। ३०. अन्तर-द्वारप्र. भन्ते ! सामायिक संयत का कितने काल का अन्तर होता है ? उ. गौतम ! जघन्य-अन्तर्मुहूर्त, उत्कृष्ट-अनन्त काल अर्थात् अनन्त अवसर्पिणी उत्सर्पिणी काल, क्षेत्र से कुछ कम-अपार्धपुद्गल परावर्तन। इसी प्रकार यथाख्यात संयत पर्यन्त जानना चाहिए। प्र. भन्ते ! अनेक सामायिक संयतों का कितने काल का अन्तर होता है? उ. गौतम ! अन्तर नहीं है अर्थात् शाश्वत है। प्र. भन्ते ! अनेक छेदोपस्थापनीय संयतों का कितने काल का अन्तर होता है? उ. गौतम ! जघन्य-त्रेसठ हजार वर्ष, उत्कृष्ट-अठारह क्रोडा-क्रोड सागरोपम। प्र. भन्ते ! अनेक परिहारविशुद्धिक संयतों का कितने काल का अन्तर होता है? उ. गौतम ! जघन्य-चौरासी हजार वर्ष, उत्कृष्ट-अठारह क्रोडा-क्रोड सागरोपम। उ. गोयमा ! जहन्नेणं-एक्कं समयं, उक्कोसेणं-अंतोमुहुत्तं। अहक्खायसंजया जहा सामाइयसंजया। ३०. अंतर-दारंप. सामाइयसंजयस्सणं भंते ! केवइयं कालं अन्तरं होइ? उ. गोयमा ! जहन्नेणं-अंतोमुहुत्तं, उक्कोसेणं-अणंतकालं, अणंताओ ओसप्पिणिउस्सप्पिणीओ कालओ, खेत्तओ अवड्ढं पोग्गल-परियढें देसूणं। एवं जाव अहक्खायसंजयस्स। प. सामाइयसंजया णं भंते ! केवइयं कालं अंतर होइ? उ. गोयमा ! नत्थि अंतरं। प. छेदोवट्ठावणियसंजया णं भंते ! केवइयं कालं अंतर होइ? उ. गोयमा !जहन्नेणं-तेवट्ठिवाससहस्साई, उक्कोसेणं-अट्ठारस सागरोवमकोडाकोडीओ। प. परिहारविसुद्धियसंजयाणं भन्ते ! केवइयं कालं अंतरं होइ? उ. गोयमा ! जहन्नेणं-चउरासीई वाससहस्साई, उक्कोसेणं-अट्ठारस सागरोवम-कोडाकोडीओ।
SR No.090159
Book TitleDravyanuyoga Part 2
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanhaiyalal Maharaj & Others
PublisherAgam Anuyog Prakashan
Publication Year1995
Total Pages806
LanguageHindi, Prakrit
ClassificationBook_Devnagari, Metaphysics, Agam, Canon, & agam_related_other_literature
File Size29 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy