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________________ ८३२ द्रव्यानुयोग-(२) प्र. भन्ते ! यथाख्यात संयत क्या सकषायी होता है या अकषायी होता है? उ. गौतम ! सकषायी नहीं होता है, अकषायी होता है। प्र. यदि वह अकषायी होता है तो क्या उपशान्त कषायी होता है या क्षीणकषायी होता है? उ. गौतम ! उपशान्त कषायी भी होता है और क्षीण कषायी भी होता है। टो प. अहक्खायसंजए णं भंते ! किं सकसायी होज्जा, अकसायी होज्जा? उ. गोयमा ! नो सकसायी होज्जा, अकसायी होज्जा। प. जइ अकसायी होज्जा, किं उवसंतकसायी होज्जा, खीणकसायी होज्जा? उ. गोयमा ! उवसंतकसायी वा होज्जा, खीणकसायी वा होज्जा। १९. लेस्सा-दारंप. सामाइयसंजए णं भंते ! किं सलेस्से होज्जा, अलेस्से होज्जा? उ. गोयमा ! सलेस्से होज्जा, नो अलेस्से होज्जा। प. जइ सलेस्से होज्जा,सेणं भन्ते ! कइसुलेसासु होज्जा? उ. गोयमा ! छसुलेसासु होज्जा,तं जहा १. कण्हलेसाए जाव ६. सुक्कलेसाए। एवं छेदोवट्ठावणिए वि। प. परिहारविसुद्धियसंजए णं भंते ! किं सलेस्से होज्जा, अलेस्से होज्जा? उ. गोयमा ! सलेस्से होज्जा, नो अलेस्से होज्जा। प. जइ सलेस्से होज्जा, सेणं भन्ते ! कइसु लेसासु होज्जा ? उ. गोयमा ! तिसु विसुद्धलेसासु होज्जा, तं जहा १.तेउलेसाए,२. पम्हलेसाए,३.सुक्कलेसाए। प. सुहुमसंपरायसंजए णं भंते ! किं सलेस्से होज्जा, अलेस्से होज्जा ? उ. गोयमा ! सलेस्से होज्जा, नो अलेस्से होज्जा। प. जइ सलेस्से होज्जा-से णं भंते ! कइसु लेसासु होज्जा? उ. गोयमा ! एक्काए सुक्कलेसाए होज्जा। प. अहक्खायसंजए णं भंते ! किं सलेस्से होज्जा, अलेस्से होज्जा? उ. गोयमा ! सलेस्से वा होज्जा,अलेस्से वा होज्जा। प. जइ सलेस्से होज्जा, सेणं भंते ! कइसु लेसासु होज्जा? उ. गोयमा ! एगाए सुक्कलेसाए होज्जा। २०. परिणाम-दारंप. सामाइयसंजएणं भंते ! किं १. वड्ढमाणपरिणामे होज्जा, १९. लेश्या-द्वारप्र. भन्ते ! सामायिक संयत क्या सलेश्यी होता है या अलेश्यी होता है? उ. गौतम ! सलेश्यी होता है, अलेश्यी नहीं होता है। प्र. भन्ते ! यदि वह सलेश्यी होता है तो कितनी लेश्यायें होती हैं ? उ. गौतम ! छ: लेश्याएँ होती हैं, यथा १. कृष्णलेश्या यावत् ६. शुक्ललेश्या। इसी प्रकार छेदोपस्थापनीय संयत भी जानना चाहिए। प्र. भन्ते ! परिहारविशुद्धिक संयत क्या सलेश्यी होता है या अलेश्यी होता है? उ. गौतम ! सलेश्यी होता है, अलेश्यी नहीं होता है। प्र. भन्ते ! यदि वह सलेश्यी होता है तो कितनी लेश्यायें होती हैं ? उ. गौतम ! तीन विशुद्ध लेश्यायें होती है, यथा १. तेजोलेश्या, २. पद्मलेश्या, ३. शुक्ललेश्या। प्र. भन्ते ! सूक्ष्म संपराय संयत क्या सलेश्यी होता है या अलेश्यी होता है? उ. गौतम ! सलेश्यी होता है, अलेश्यी नहीं होता है। प्र. भन्ते ! यदि वह सलेश्यी होता है तो कितनी लेश्यायें होती हैं ? उ. गौतम ! एक शुक्ललेश्या होती है। प्र. भन्ते ! यथाख्यात संयत क्या सलेश्यी होता है या अलेश्यी होता है ? उ. गौतम ! सलेश्यी भी होता है और अलेश्यी भी होता है। प्र. भन्ते ! यदि वह सलेश्यी होता है तो कितनी लेश्यायें होती हैं ? उ. गौतम ! एक शुक्ललेश्या होती है। २०. परिणाम-द्वारप्र. भन्ते ! सामायिक संयत क्या १. वर्धमान परिणाम वाला होता है, २. हायमान परिणाम वाला होता है, ३. अवस्थित परिणाम वाला होता है ? उ. गौतम ! १. वर्धमान परिणाम वाला भी होता है, २. हायमान परिणाम वाला भी होता है, ३. अवस्थित परिणाम वाला भी होता है। इसी प्रकार परिहारविशुद्धिक संयत पर्यन्त जानना चाहिए। प्र. भन्ते ! सूक्ष्म संपराय संयत क्या वर्धमान परिणाम वाला होता है, हायमान परिणाम वाला होता है या अवस्थित परिणाम वाला होता है ? उ. गौतम ! वर्धमान परिणाम वाला भी होता है, हायमान परिणाम वाला भी होता है किन्तु अवस्थित परिणाम वाला नहीं होता है। २. हायमाण परिणामे होज्जा, ३. अवट्ठियपरिणामे होज्जा ? उ. गोयमा !१.वड्ढमाण्परिणामे वा होज्जा, २. हायमाणपरिणामे वा होज्जा, ३. अवट्ठिपरिणामे वा होज्जा। एवं जाव परिहारविसुद्धियसंजए। प. सुहमसंपरायसंजए णं भंते ! किं वड्ढमाणपरिणामे होज्जा, हायमाणपरिणामे होज्जा, अवट्ठियपरिणामे होज्जा ? उ. गोयमा ! वड्ढमाणपरिणामे वा होज्जा, हायमाणपरिणामे वा होज्जा, नो अवट्ठियपरिणामे होज्जा।
SR No.090159
Book TitleDravyanuyoga Part 2
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanhaiyalal Maharaj & Others
PublisherAgam Anuyog Prakashan
Publication Year1995
Total Pages806
LanguageHindi, Prakrit
ClassificationBook_Devnagari, Metaphysics, Agam, Canon, & agam_related_other_literature
File Size29 MB
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