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________________ संयत अध्ययन प. जइ सजोगी होज्जा किं मणजोगी होज्जा, वइजोगी होज्जा, कायजोगी होज्जा? उ. गोयमा ! मणजोगी वा होज्जा, वइजोगी वा होज्जा, कायजोगी वा होज्जा। एवं जाव सुहमसंपरायसंजए। प. अहक्खायसंजए णं भन्ते! किं सजोगी होज्जा, अजोगी होज्जा? उ. गोयमा ! सजोगी वा होज्जा,अजोगी वा होज्जा। प. जइ सजोगी होज्जा किं मणजोगी होज्जा, वइजोगी होज्जा, कायजोगी होज्जा? उ. गोयमा ! मणजोगी वा होज्जा, वइजोगी वा होज्जा, कायजोगी वा होज्जा। १७. उवओग-दारंप. सामाइयसंजए णं भन्ते ! किं सागारोवउत्ते होज्जा, अणागारोवउत्ते होज्जा? उ. गोयमा ! सागारोवउत्ते वा होज्जा, अणागारोवउत्ते वा हाज्जा। एवं जाव अहक्खाए। णवरं-सुहुमसंपराए सागारोवउत्ते होज्जा, नो अणागारोवउत्ते होज्जा। १८. कसाय-दारंप. सामाइयसंजए णं भन्ते ! किं सकसायी होज्जा, अकसायी होज्जा? उ. गोयमा ! सकसायी होज्जा, नो अकसायी होज्जा। प. जइसकसायी होज्जा,सेणं भन्ते ! कइसु कसाएसु होज्जा? उ. गोयमा ! चउसु वा, तिसुवा, दोसु वा होज्जा। चउसु होमाणे-चउसु १. संजलण कोह, २. माण, ३.माया,४.लोभेसु होज्जा। तिसु होमाणे-तिसु १. संजलण माण, २. माया, ३.लोभेसु होज्जा। दोसु होमाणे-दोसु १.संजलण माया,२.लोभेसु होज्जा। एवं छेदोवट्ठावणिए वि। प. परिहारविसुद्धिए णं भन्ते ! किं सकसायी होज्जा, अकसायी होज्जा? उ. गोयमा ! सकसायी होज्जा, नो अकसायी होज्जा। प. जइसकसायी होज्जा,सेणं भन्ते! कइसुकसाएस होज्जा? उ. गोयमा ! चउसु संजलण कोह-माण-माया-लोभेसु होज्जा। - ८३१ ) प्र. यदि सयोगी होता है तो क्या मनयोगी होता है, वचनयोगी होता है या काययोगी होता है? उ. गौतम ! मनयोगी भी होता है, वचनयोगी भी होता है और काययोगी भी होता है। इसी प्रकार सूक्ष्म संपराय संयत पर्यन्त जानना चाहिए। प्र. भन्ते ! यथाख्यात संयत क्या सयोगी होता है या अयोगी होता है? उ. गौतम ! सयोगी भी होता है और अयोगी भी होता है। प्र. यदि सयोगी होता है तो क्या मनयोगी होता है, वचनयोगी होता है या काययोगी होता है? उ. गौतम ! मनयोगी भी होता है, वचनयोगी भी होता है और काययोगी भी होता है। १७. उपयोग-द्वारप्र. भन्ते ! सामायिक संयत क्या साकारोपयुक्त होता है या अनाकारोपयुक्त होता है? उ. गौतम ! साकारोपयुक्त भी होता है और अनाकारोपयुक्त भी होता है। इस प्रकार यथाख्यात संयत पर्यन्त जानना चाहिए। विशेष-सूक्ष्म संपराय संयत साकारोपयुक्त ही होता है अनाकारोपयुक्त नहीं होता है। कषाय-द्वारप्र. भन्ते ! सामायिक संयत क्या सकषायी होता है या अकषायी होता है? उ. गौतम ! सकषायी होता है अकषायी नहीं होता है। प्र. भन्ते ! यदि सकषायी होता है तो कितने कषाय होते हैं ? उ. गौतम ! चार, तीन या दो कषाय होते हैं। चार हों तो-१. संज्वलन क्रोध,२. मान,३. माया, ४. लोभ। १८. कषाय-द्वार तीन हों तो-१. संज्वलन मान, २. माया, ३. लोभ। दो हों तो-१. संज्वलन माया और २. लोभ होते हैं। इसी प्रकार छेदोपस्थापनीय संयत भी जानना चाहिए। प्र. भन्ते ! परिहारविशुद्धिक संयत क्या सकषायी होता है या अकषायी होता है? उ. गौतम ! सकषायी होता है, अकषायी नहीं होता है। प्र. भन्ते ! वह यदि सकषायी होता है तो कितने कषाय होते हैं ? उ. गौतम ! संज्वलन क्रोध, मान, माया, लोभ ये चार कषाय होते हैं। प्र. भन्ते ! सूक्ष्म संपराय संयत क्या सकषायी होता है या अकषायी होता है? उ. गौतम ! सकषायी होता है, अकषायी नहीं होता है। प्र. भन्ते ! वह यदि सकषायी होता है तो कितने कषाय होते हैं ? प. सुहमसंपराए णं भन्ते ! किं सकसायी होज्जा, अकसायी होज्जा? उ. गोयमा ! सकसायी होज्जा, नो अकसायी होज्जा। प. जइ सकसायी होज्जा, से णं भन्ते ! कइसु कसाएसु होज्जा? र गोयमा । गम्मि संजलणे लोभे होज्जा। उ. गौतम ! एक संज्वलन लोभ होता है।
SR No.090159
Book TitleDravyanuyoga Part 2
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanhaiyalal Maharaj & Others
PublisherAgam Anuyog Prakashan
Publication Year1995
Total Pages806
LanguageHindi, Prakrit
ClassificationBook_Devnagari, Metaphysics, Agam, Canon, & agam_related_other_literature
File Size29 MB
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