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________________ ८१४ प. बउसे णं भंते! किं सण्णोवउत्ते होज्जा, नोसण्णोवउत्ते होज्जा ? उ. गोयमा ! सण्णोवउत्ते या होज्जा, नोसण्णोवउत्ते या होज्जा | पडिसेवणाकुसीले कसायकुसीले वि एवं चैव । नियंठे सिणाए व जहा पुलाए, ' २६. आहार दारं प. पुलाए णं भंते! कि आहारए होज्जा, अणाहारए होज्जा ? उ. गोयमा ! आहारए होज्जा, नो अणाहारए होज्जा । एवं जाव नियं प. सिणाए णं भंते! कि आहारए होज्जा, अणाहारए होज्जा ? उ. गोयमा ! आहारए वा होज्जा, अणाहारए वा होज्जा, २७. भव-दारं प. पुलाए णं भंते! कइ भवग्गहणाई होज्जा ? उ. गोयमा ! जहन्त्रेणं एक्कं, उक्कोसेणं तिण्णि । प. बउसे णं भंते! कइ भवग्गहणाई होज्जा ? उ. गोवमा ! जहन्नेणं एक्कं उक्कोसेणं अट्ठ पडिसेवणाकुसीले कसायकुसीले वि एवं चेव । णियंठे जहा पुलाए, प. सिणाए णं भंते! कइ भवग्गहणाई होज्जा ? उ. गोयमा ! एक्कं २८. आगरिस-दार प. पुलागस्स णं भंते! एगभवग्गहणिया केवइया आगरिसा पण्णत्ता ? उ. गोयमा ! जहत्रेणं एक्को, उक्कोसेणं तिणि। प. बउसस्स णं भंते ! एगभवग्गहणिया केवइया आगरिसा पण्णत्ता ? उ. गोयमा ! जहन्नेणं एक्को, उक्कोसेणं सयग्गसो । पडि सेवणाकुसीले कसायकुसीले वि एवं चेव । प. णियंठस्स णं भंते ! एगभवग्गहणिया केवइया आगरिसा पण्णत्ता ? उ. गोयमा ! जहन्नेणं एक्को, उक्कोसेणं दोन्नि । प. सिणायस्स णं भंते! एगभवग्गहणिया केवहया आगरिसा पण्णत्ता ? उ. गोयमा ! एक्को । प. पुलागस्स णं भंते! नाणाभवग्गहणिया केवइया आगरिसा पण्णत्ता ? १. ठाणं अ. ३, उ. २, सु. १६६ द्रव्यानुयोग - (२) प्र. भन्ते ! बकुश क्या संज्ञोपयुक्त होता है या नोसंज्ञोपयुक्त होता है ? उ. गौतम ! संज्ञोपयुक्त भी होता है और नोसंज्ञोपयुक्त भी होता है। प्रतिसेवनाकुशील और कषायकुशील भी इसी प्रकार जानना चाहिए। निर्ग्रन्थ और स्नातक का कथन पुलाक के समान है। आहार द्वार भन्ते ! पुलाक क्या आहारक होता है या अनाहारक होता है ? २६. प्र. उ. गौतम ! आहारक होता है, अनाहारक नहीं होता है। इसी प्रकार निर्ग्रन्थ पर्यन्त जानना चाहिए। प्र. भन्ते ! स्नातक आहारक होता है या अनाहारक होता है ? उ. गौतम ! आहारक भी होता है और अनाहारक भी होता है। २७. भव-द्वार प्र. भन्ते ! पुलाक कितने भवों में होता है ? उ. गौतम ! जघन्य एक, उत्कृष्ट तीन भव में होता है। भन्ते ! बकुश कितने भवों में होता है ? प्र. उ. गौतम ! जघन्य एक, उत्कृष्ट आठ भव में होता है। प्रतिसेवनाकुशील और कषायकुशील भी इसी प्रकार जानना चाहिए। निर्ग्रन्थका कथन पुलाक के समान जानना चाहिए। प्र. भन्ते ! स्नातक कितने भवों में होता है ? उ. गौतम ! एक भव में ही होता है। २८. आकर्ष-द्वार प्र. भन्ते ! पुलाक के एक भवग्रहण योग्य कितने आकर्ष होते हैं ? अर्थात् पुलाक एक भव में कितनी बार होता है ? गौतम ! जघन्य एक, उत्कृष्ट तीन बार होता है। उ. प्र. भन्ते ! बकुश के एक भवग्रहण योग्य कितने आकर्ष कहे गए हैं, अर्थात् कितनी बार होता है? उ. गौतम ! जघन्य एक, उत्कृष्ट सैकड़ों बार होता है। प्रतिसेवनाकुशील और कषायकुशीत भी इसी प्रकार जानना चाहिए। प्र. भन्ते ! निर्ग्रन्थ के एक भवग्रहण योग्य कितने आकर्ष कहे गए है, अर्थात् कितनी बार होता है? उ. गौतम ! जघन्य एक, उत्कृष्ट दो बार होता है। प्र. भन्ते ! स्नातक के एक भवग्रहण योग्य कितने आकर्ष कहे गए है अर्थात कितनी बार होता है? उ. गौतम ! एक बार होता है। प्र. भन्ते ! पुलाक के अनेक भव ग्रहण योग्य कितने आकर्ष कहे गए हैं, अर्थात् कितनी बार होता है ?
SR No.090159
Book TitleDravyanuyoga Part 2
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanhaiyalal Maharaj & Others
PublisherAgam Anuyog Prakashan
Publication Year1995
Total Pages806
LanguageHindi, Prakrit
ClassificationBook_Devnagari, Metaphysics, Agam, Canon, & agam_related_other_literature
File Size29 MB
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