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________________ संयत अध्ययन प. णियंठे णं भंते ! कइ कम्मपगडीओ उदीरेइ? उ. गोयमा ! पंचविह उदीरए वा, दुविह उदीरए वा। पंच उदीरेमाणे-आउय-वेयणिज्ज-मोहणिज्जवज्जाओ पंच कम्मपगडीओ उदीरेइ, दो उदीरेमाणे नामंच, गोयं च उदीरेइ। प. सिणाएणं भंते ! कइ कम्मपगडीओ उदीरेइ? उ. गोयमा ! दुविह उदीरए वा, अणुदीरए वा। दो उदीरेमाणे-नामंच, गोयं च उदीरेइ, २४. उवसंपज्जहण-दारंप. पुलाए णं भंते ! पुलायत्तं जहमाणे किं जहइ, किं उवसंपज्जइ? उ. गोयमा ! पुलायत्तं जहइ, कसायकुसीलवा,असंजमंवा उवसंपज्जइ। प. बउसे णं भंते ! बउसत्तं जहमाणे किं जहइ, किं उवसंपज्जइ? उ. गोयमा ! बउसत्तं जहइ, पडिसेवणाकुसील वा, कसायकुसीलं वा, असंजमं वा, संजमासंजमं वा उवसंपज्जइ। प. पडिसेवणाकुसीले णं भंते ! पडिसेवणाकुसीलतं जहमाणे किं जहइ, किं उवसंपज्जइ? उ. गोयमा ! पडिसेवणाकुसीलतं जहइ, बउसं वा, कसायकुसीलं वा, असंजमं वा, संजमासंजमं वा उवसंपज्जइ, प. कसायकुसीले णं भंते ! कसायकुसीलतं जहमाणे किं जहइ, किं उवसंपज्जइ? उ. गोयमा ! कसायकुसीलत्तं जहइ, पुलायं वा; बउसं वा, पडिसेवणाकुसील वा, णियंठं वा, असंजमं वा, संजमासंजमं वा उवसपंज्जइ, प. णियंठे णं भंते ! णियंठत्तं जहमाणे किं जहइ, किं उवसंपज्जइ? उ. गोयमा ! नियंठत्तं जहइ, कसायकुसीलं वा, सिणायं वा,असंजमं वा उवसंपज्जइ। प. सिणाए णं भंते ! सिणायत्तं जहमाणे किं जहइ, किं उवसंपज्जइ? उ. गोयमा ! सिणायत्तं जहइ, सिद्धगई उवसंपज्जइ। सण्णा-दारंप. पुलाए णं भंते ! किं सण्णोवउत्ते होज्जा, नोसण्णोवउत्ते होज्जा? उ. गोयमा ! नोसण्णोवउत्ते होज्जा। प्र. भन्ते ! निर्ग्रन्थ कितनी कर्म प्रकृतियों की उदीरणा करता है? उ. गौतम ! पांच की उदीरणा करता है या दो की उदीरणा करता है। पांच की उदीरणा करता हुआ-१.आय.२.वेदनीय और ३. मोहनीय को छोड़कर शेष पांच कर्मप्रकृतियों की उदीरणा करता है। दो की उदीरणा करता हुआ-नाम और गोत्र कर्म की उदीरणा करता है। प्र. भन्ते ! स्नातक कितनी कर्म प्रकृतियों की उदीरणा करता है? उ. गौतम ! दो की उदीरणा करता है और नहीं भी करता है। दो की उदीरणा करता हुआ-नामकर्म और गोत्रकर्म की उदीरणा करता है। २४. उपसंपत्-जहन-द्वारप्र. भन्ते ! पुलाक पुलाकत्व को छोड़ने पर क्या छोड़ता है और क्या प्राप्त करता है? उ. गौतम ! पुलाकत्व को छोड़ता है, कषायकुशील या असंयम को प्राप्त करता है। प्र. भन्ते ! बकुश बकुशत्व को छोड़ने पर क्या छोड़ता है और क्या प्राप्त करता है? उ. गौतम ! बकुशत्व को छोड़ता है, प्रतिसेवनाकुशील, कषायकुशील, असंयम या संयमासंयम को प्राप्त करता है। प्र. भन्ते ! प्रतिसेवनाकुशील प्रतिसेवनाकुशीलत्व को छोड़ने पर क्या छोड़ता है और क्या प्राप्त करता है? उ. गौतम ! प्रतिसेवनाकुशीलत्व को छोड़ता है। बकुश, कषायकुशील, असंयम या संयमासंयम को प्राप्त करता है। प्र. भन्ते ! कषायकुशील कषायकुशीलत्व को छोड़ने पर क्या छोड़ता है और क्या प्राप्त करता है? उ. गौतम ! कषायकुशीलत्व को छोड़ता है। पुलाक, बकुश, प्रतिसेवनाकुशील, निर्ग्रन्थ, असंयम या संयमासंयम को प्राप्त करता है। प्र. भन्ते ! निर्ग्रन्थ निर्ग्रन्थत्व को छोड़ने पर क्या छोड़ता है और क्या प्राप्त करता है? उ. गौतम ! निर्ग्रन्थत्व को छोड़ता है। कषायकुशील, स्नातक या असंयम को प्राप्त होता है। प्र. भन्ते ! स्नातक स्नातकत्व को छोड़ने पर क्या छोड़ता है और क्या प्राप्त करता है? उ. गौतम ! स्नातकत्व को छोड़ता है। सिद्धत्व को प्राप्त करता है। २५. संज्ञा-द्वारप्र. भन्ते ! पुलाक क्या संज्ञोपयुक्त होता है या नोसंज्ञोपयुक्त होता है? उ. गौतम ! नोसंज्ञोपयुक्त होता है।
SR No.090159
Book TitleDravyanuyoga Part 2
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanhaiyalal Maharaj & Others
PublisherAgam Anuyog Prakashan
Publication Year1995
Total Pages806
LanguageHindi, Prakrit
ClassificationBook_Devnagari, Metaphysics, Agam, Canon, & agam_related_other_literature
File Size29 MB
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