SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 60
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ ७९९ । उ. गौतम ! उपशान्त कषाय वीतराग भी होता है, क्षीण कषाय वीतराग भी होता है। प्र. ५. भंते ! स्नातक क्या सराग होता है या वीतराग होता है ? संयत अध्ययन उ. गोयमा ! उवसंतकसाय-वीयरागे वा होज्जा, खीणकसाय-वीयरागे वा होज्जा। प. ५. सिणाए णं भंते ! किं सरागे होज्जा, वीयरागे होज्जा? उ. गोयमा ! जहा णियंठे तहा सिणाए वि। णवरं-नो उवसंतकसाय-वीयरागे होज्जा, खीणकसाय वीयरागे होज्जा। ४. कप्प-दारंप. १. पुलाए णं भंते ! किं ठियकप्पे होज्जा, अठियकप्पे होज्जा? उ. गोयमा ! ठियकप्पे वा होज्जा, अठियकप्पे वा होज्जा, उ. गौतम ! निर्ग्रन्थ के समान ही स्नातक का कथन करना चाहिए। विशेष-स्नातक उपशान्तकषाय वीतराग नहीं होता है, किन्तु क्षीणकषाय-वीतराग होता है। ४. कल्प-द्वारप्र. १. भंते ! पुलाक क्या स्थितकल्पी होता है या अस्थितकल्पी होता है? उ. गौतम ! स्थितकल्पी भी होता है और अस्थितकल्पी भी होता है। इसी प्रकार स्नातक पर्यन्त जानना चाहिए। (२-५) एवं जाव सिणाए। प. १. पुलाए णं भंते ! किं जिणकप्पे होज्जा,थेरकप्पे होज्जा, कप्पातीते होज्जा? उ. गोयमा ! नो जिणकप्पे होज्जा, नो कप्पातीते होज्जा, थेरकप्पे होज्जा। प. २.बउसे णं भंते ! किं जिणकप्पे होज्जा, थेरकप्पे होज्जा, कप्पातीते होज्जा? उ. गोयमा ! जिणकप्पे वा होज्जा, थेरकप्पे वा होज्जा, नो कप्पातीते होज्जा। (३ क) एवं पडिसेवणाकुसीले वि। प. (३ख) कसायकुसीले णं भंते ! किं जिणकप्पे होज्जा, थेरकप्पे होज्जा, कप्पातीते होज्जा? उ. गोयमा ! जिणकप्पे वा होज्जा, थेरकप्पे वा होज्जा, कप्पातीते वा होज्जा, प. ४.नियंठे णं भंते ! किं जिणकप्पे होज्जा,थेरकप्पे होज्जा, कप्पातीते होज्जा? उ. गोयमा ! नो जिणकप्पे होज्जा, नो थेरकप्पे होज्जा, कप्पातीते होज्जा, ५. एवं सिणाए वि। चरित्त-दारंप. पुलाए णं भंते ! किं-१.सामाइयसंजमे होज्जा, २.छेदोवट्ठावणियसंजमे होज्जा, ३.परिहारविसुद्धियसंजमे होज्जा, ४. सुहुमसंपरायसंजमे होज्जा, ५.अहक्खायसंजमे होज्जा? गोयमा !१.सामाइयसंजमे वा होज्जा, २.छेदोवट्ठावणियसंजमे वा होज्जा, ३.नो परिहारविसुद्धियसंजमे होज्जा, ४.नो सुहुमसंपरायसंजमे होज्जा,५.नो अहक्खायसंजमे होज्जा। बउसे, पडिसेवणा-कुसीले विएवं चेव। प. कसाय-कुसीले णं भंते ! किं सामाइयसंजमे होज्जा जाव अहक्वायसंजमे होज्जा? गोयमा ! सामाइयसंजमे वा होज्जा जाव सुहमसंपराय संजमे वा होज्जा, नो अहक्खायसंजमे होज्जा। प्र. १. भंते ! पुलाक क्या जिनकल्पी होता है, स्थविरकल्पी होता हैया कल्पातीत होता है? उ. गौतम ! जिनकल्पी नहीं होता है, कल्पातीत भी नहीं होता है किन्तु स्थविरकल्पी होता है। प्र. २. भंते ! बकुश क्या जिनकल्पी होता है, स्थविरकल्पी होता है या कल्पातीत होता है? उ. गौतम ! जिनकल्पी भी होता है,स्थविरकल्पी भी होता है किन्तु कल्पातीत नहीं होता है। (३क) प्रतिसेवनाकुशील का कथन भी इसी प्रकार जानना चाहिए। प्र. (३ख) भंते ! कषायकुशील क्या जिनकल्पी होता है, स्थविरकल्पी होता है या कल्पातीत होता है? उ. गौतम ! जिनकल्पी भी होता है, स्थविरकल्पी भी होता है और कल्पातीत भी होता है। प्र. ४. भंते ! निर्ग्रन्थ क्या जिनकल्पी होता है, स्थविरकल्पी होता है या कल्पातीत होता है? उ. गौतम !न जिनकल्पी होता है, न स्थविरकल्पी होता है, किन्तु कल्पातीत होता है। ५. स्नातक का कथन भी इसी प्रकार करना चाहिए। ५. चारित्र-द्वारप्र. भंते ! पुलाक क्या-१. सामायिक संयमवाला होता है, २.छेदोपस्थापनीय संयमवाला होता है,३. परिहार-विशुद्धक संयमवाला होता है, ४. सूक्ष्म-सम्पराय संयमवाला होता है, ५. यथाख्यात संयमवाला होता है? उ. गौतम ! १. सामायिक संयमवाला होता है, २.छेदोपस्थापनीय संयमवाला होता है, ३.परिहार विशुद्धक संयमवाला नहीं होता है, ४. सूक्ष्म-सम्पराय संयमवाला नहीं होता है, ५. यथाख्यात संयमवाला नहीं होता है। बकुश और प्रतिसेवनाकुशील का कथन भी इसी प्रकार है। भंते ! कषायकुशील क्या सामायिक संयम वाला है यावत् यथाख्यात संयमवाला है? उ. गौतम ! सामायिक संयमवाला भी होता है यावत् सूक्ष्म सम्पराय संयमवाला भी होता है। यथाख्यात संयमवाला नहीं होता है।
SR No.090159
Book TitleDravyanuyoga Part 2
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanhaiyalal Maharaj & Others
PublisherAgam Anuyog Prakashan
Publication Year1995
Total Pages806
LanguageHindi, Prakrit
ClassificationBook_Devnagari, Metaphysics, Agam, Canon, & agam_related_other_literature
File Size29 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy