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________________ क्रिया अध्ययन एवं खलु तस्स तप्पत्तियं सावज्जे त्ति आहिज्जइ। दुवालसमे किरियाठाणे लोभवत्तिए त्ति आहिए। ९४७ ) इस प्रकार विषय-लोलुपता के कारण उस पुरुष को लोभप्रत्ययिक सावध पाप कर्म का बन्ध होता है। यह बारहवां लोभ प्रत्ययिक दण्ड समादान (क्रिया स्थान) कहा गया है। ये बारह क्रियास्थान राग-द्वेष से मुक्त श्रमण, बाह्मण को सम्यक् प्रकार से जान लेना चाहिए। ५८. अधर्म युक्त मिश्र स्थान के स्वरूप का प्ररूपण अब तीसरे स्थान मिश्र का विकल्प इस प्रकार कहा जाता हैजो ये आरण्यक (अरण्यवासी तपस्वी) आदि होते हैं यावत वे मरकर-असुरों में या किल्विषिक स्थानों में उत्पन्न होते हैं। वे वहाँ से मरकर पुनः मेमने की भाँति गूंगे और अंधे रूप में जन्म लेते हैं। यह स्थान अनार्य यावत् सब दुःखों के क्षय का अमा, एकान्त मिथ्या और बुरा है। यह तीसरे स्थान मिश्र पक्ष का विकल्प इस प्रकार कहा गया है। इच्चेयाई दुवालस किरियाठाणाई दविएणं समणेण वा, माहणेण वा सम्म सुपरिजाणियव्वाइं भवंति। -सूय. सु. २, अ.२, सु.६९५-७०६ ५८. अधम्म बहुल मिस्सठाणस्स सरूव परूवणं अहावरे तच्चस्स ठाणस्स मिस्सगस्स विभंगे एवमाहिज्जइजे इमे भवंति–आरण्णिया जाव अन्नयरेसु आसुरिएसु किब्बिसिएसु ठाणेसु उववत्तारो भवंति। तओ विप्पमुच्चमाणा भुज्जो एलमूयत्ताए तमूयत्ताए पच्चायंति। एस ठाणे अणारिए जाव असव्वदुक्खप्पहीणमग्गे एगंतमिच्छे असाहू। एस खलु तच्चस्स ठाणस्स मिस्सगस्स विभंगे एवमाहिए। -सूय.सु.२,अ.२.सु.७१२ इच्चेएहिं बारसएहिं किरिया ठाणेहिं वट्टमाणा जीवा नो सिज्झिंसु जाव नो सव्वदुक्खाणमंतं करेंसु वा, करेंति वा, करिस्संति वा। -सूय.सु.२, अ.२, सु.७२१ (१) ५९. अधम्म पक्खे पावादुयाणं समाहरणं एवामेव समणुगम्ममाणा इमेहिं चेव दोहिं ठाणेहिं समोयरंति, तं जहाधम्मे चेव, अधम्मे चेक, उवसंते चेव, अणुवसंते चेव। तत्थ णं जे से पढमस्स ठाणस्स अधम्मपक्खस्स विभंगे एवमाहिए। तस्स णं इमाई तिण्णि तेवट्ठाइं पावाउयसयाइं भवंतीतिमक्खायाई,तं जहा१. किरियावाईणं, २. अकिरियावाईणं, ३. अण्णाणियवाईणं, ४. वेणइयवाईणं, ते वि निव्वाणमाहंसु, ते वि पलिमोक्खमाहंसु, इन (पूर्वोक्त) बारह क्रिया स्थानों में वर्तमान जीव न सिद्ध हुए हैं, न होते हैं और न होंगे यावत् न दुःखों का अन्त किया है, न करते हैं और न करेंगे। ५९. अधर्म पक्ष में प्रावादुकों का समाहरण इस प्रकार पूर्व प्रतिपादित तीन पक्ष इन दो स्थानों में समवतरित हो जाते हैं, जैसेधर्म में और अधर्म में, उपशांत में और अनुपशांत में। वहाँ जो प्रथम स्थान अधर्मपक्ष का है उसका विभंग इस प्रकार कहा गया है, उसमें ये तीन सौ तिरेसठ प्रावदुक अर्थात् दार्शनिक कहे गये हैं, जैसे१. क्रियावादी, २. अक्रियावादी, ३. अज्ञानवादी, ४. विनयवादी। उन्होंने निर्वाण का कथन किया है, उन्होंने मोक्ष का भी कथन किया हैं, वे श्रावकों का कथन भी करते हैं और वे धर्म गुरुओं का कथन भी करते हैं। ६०. अधर्म पक्ष में पुरुषों की प्रवृत्ति और परिणाम कोई प्राणी मनुष्य अपने लिए, ज्ञातिजनों के लिए, शयन सामग्री के लिए, घर बनाने के लिए, परिवार के लिए, परिचितजन या पड़ोसी के लिए निम्नोक्त पापकर्म का आचरण करता है१. आनुगामिक (सहगामी) बनकर, २. अथवा उपचरक (सेवक) बनकर, ३. अथवा प्रातिपथिक (मार्ग में लटने वाला) बनकर, ४. अथवा संधिच्छेदक (सेंध लगाने वाला) बनकर, ५. अथवा ग्रन्थिच्छेदक (गांठ काटने वाला) बनकर, ६. अथवा औरभ्रिक (भेड़ का वध करने वाला) बनकर, ७. अथवा सौकरिक (सुअर का वध करने वाला) बनकर, ते वि लवंति सावगा, ते वि लवंति सावइत्तारो। -सुय. सु.२, अ.२, सु.७१७ ६०. अधम्म पक्खीय पुरिसाणं पवित्ति परिणामोय से एगइओ आयहेउं वा, णायहेउं वा, सयणहेउं वा, अगारहेउं वा, परिवार हेउवा, नायगं वा, सहवासियं वा णिस्साए १. अणुगामिए, २. अदुवा उवचरए, ३. अदुवा पाडिपहिए, ४. अदुवा संधिच्छेयए, ५. अदुवा गंठिच्छेयए, ६. अदुवा ओरभिए, ७. अदुवा सोयरिए,
SR No.090159
Book TitleDravyanuyoga Part 2
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanhaiyalal Maharaj & Others
PublisherAgam Anuyog Prakashan
Publication Year1995
Total Pages806
LanguageHindi, Prakrit
ClassificationBook_Devnagari, Metaphysics, Agam, Canon, & agam_related_other_literature
File Size29 MB
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