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________________ ज्ञान अध्ययन ६९१ "केवली यावत् उसकी उपासिका से सुने बिना ही, कोई जीव शुद्ध आभिनिबोधिकज्ञान प्राप्त करता है, से णं असोच्चा "केवलिस्स वा जाव तप्पक्खियाए उवासियाए वा अत्थेगइए केवलं आभिणिबोहियनाणं उप्पाडेज्जा, अत्थेगइए केवलं आभिणिबोहियनाणं नो उप्पाडेज्जा।" एवं जहा आभिनिबोहियनाणस्स वत्तव्यया भणिया तहा सुयनाणस्स विभाणियव्या, णवरं-सुयनाणावरणिज्जाणं कम्माणं खओवसमे भाणियव्ये। एवं चेव केवलं ओहिनाणं भाणियव्यं णवरं-ओहिनाणावरणिज्जाणं कम्माणं खओवसमे भाणियव्ये। एवं चेव केवलं मणपज्जवनाणं भाणियव्वं, णवरं-मणपज्जवनाणावरणिज्जाणं कम्माणं खओवसमे भाणियव्वे। एवं चेव केवलणाणं भाणियव्वं, णवरं-केवलनाणावरणिज्जाणं कम्माणं खए भाणियब्वे। सेसं तं चेव। प. असोच्चा णं भंते ! केवलिस्स वा जाव तप्पक्खियउवासियाए वा१. केवलिपण्णत्तं धम्म लभेज्ज सवणयाए जाव ११. केवलनाणं उप्पाडेज्जा? उ. गोयमा ! असोच्चा णं केवलिस्स वा जाव तप्पक्खियउवासिए वा१. अत्थेगइए केवलिपण्णत्तं धम्मं लभेज्ज सवणयाए, अत्थेगइए केवलिपण्णत्तं धम्मं नो लभेज्ज सवणयाए जाव ११.अत्थेगइए केवलनाणं उप्पाडेज्जा, अत्थेगइए केवलनाणं नो उप्पाडेज्जा। कोई जीव शुद्ध आभिनिबोधिकज्ञान प्राप्त नहीं करता है।" जिस प्रकार आभिनिबोधिकज्ञान का कथन किया गया है उसी प्रकार शुद्ध श्रुतज्ञान के विषय में भी कहना चाहिए। विशेष-यहां श्रुतज्ञानावरणीय कर्म का क्षयोपशम कहना चाहिए। इसी प्रकार शुद्ध अवधिज्ञान के उपार्जन के विषय में कहना चाहिए। विशेष-यहां अवधिज्ञानावरणीय कर्म का क्षयोपशम कहना चाहिए। इसी प्रकार शुद्ध मनःपर्यवज्ञान के उत्पन्न होने के विषय में कहना चाहिए। विशेष-मनःपर्यवज्ञानावरणीय कर्म के क्षयोपशम का कथन करना चाहिए। इसी प्रकार केवलज्ञान के उत्पन्न होने के विषय में भी कथन करना चाहिए। विशेष-यहाँ केवलज्ञानावरणीय कर्म का क्षय कहना चाहिए। शेष कथन पूर्ववत् जानना चाहिए। प्र. भन्ते ! केवलि यावत् केवलिपाक्षिक उपासिका से धर्म श्रवण किये बिना ही क्या१. कोई केवलि प्ररूपित धर्म श्रवण लाभ प्राप्त करता है यावत् ११. केवलज्ञान उत्पन्न कर सकता है? उ. गौतम ! केवली यावत् केवलिपाक्षिक उपासिका से सुने बिना ही, १.कोई जीव केवलि प्ररूपित धर्म श्रवण लाभ प्राप्त करता है और कोई जीव केवलि प्ररूपित धर्म श्रवण का लाभ प्राप्त नहीं करता है यावत् ११.कोई जीव केवलज्ञान उपार्जन कर सकता है और कोई जीव केवलज्ञान उपार्जन नहीं कर सकता है। प्र. भन्ते ! किस कारण से आप ऐसा कहते हैं कि धर्म श्रवण किये बिना यावत् कोई जीव केवलज्ञान उपार्जन कर सकता है और कोई जीव केवलज्ञान उपार्जन नहीं कर सकता है? उ. गौतम ! १. जिस जीव ने ज्ञानावरणीय कर्म का क्षयोपशम नहीं किया है यावत् ११. केवलज्ञानावरणीय कर्म का क्षय नहीं किया है। वह केवलि यावत् केवलिपाक्षिक उपासिका से बिना सुने केवलि प्ररूपित धर्म श्रवण का लाभ प्राप्त नहीं कर सकता है यावत् केवलज्ञान को उत्पन्न नहीं कर पाता है। जिस जीव ने ज्ञानावरणीय कर्म का क्षयोपशम किया है यावत् जिसने केवलज्ञानावरणीय कर्म का क्षय किया है वह प. से केणठेणं भंते ! एवं वुच्चइ "असोच्चा णं जाव अत्थेगइए केवलनाणं उप्पाडेज्जा, अत्थेगइए केवलनाणं नो उप्पाडेज्जा?" उ. गोयमा ! १. जस्स णं नाणावरणिज्जाणं कम्माणं खओवसमे नो कडे भवइ जाव ११. जस्स णं केवलनाणावरणिज्जाणं कम्माणं खए नो कडे भवइ, से णं असोच्चा केवलिस्स वा जाव तप्पक्खियउवासियाए वा केवलिपण्णत्तं धमं नो लभेज्ज सवणयाए जाव केवलनाणं नो उप्पाडेज्जा। जस्स णं नाणावरणिज्जाणं कम्माणं खओवसमे कडे भवइ जाव जस्स णं केवलनाणावरणिज्जाणं कम्माणं
SR No.090158
Book TitleDravyanuyoga Part 1
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanhaiyalal Maharaj & Others
PublisherAgam Anuyog Prakashan
Publication Year1994
Total Pages910
LanguageHindi, Prakrit
ClassificationBook_Devnagari, Metaphysics, Agam, Canon, & agam_related_other_literature
File Size32 MB
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