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________________ ( ४५८ ।। उ. गोयमा ! समणे भगवं महावीरे तच्चं गोयमं वायुभूति अणगारं एवं वयासिजं णं गोयमा ! तव दोच्चे गोयमे अग्गिभूई अणगारे एबमाइक्खइ जाव परूवेइ “एवं खलु गोयमा ! चमरेणं असुरिंदे असुरराया एमहिड्ढीए एवं तं चेव सव्वं जाव अग्गमहिसीणं वत्तव्वया समत्ता" सच्चे णं एसमठे, अहं पि णं गोयमा ! एवमाइक्खामि जाव परूवेमि एवं खलु गोयमा ! चमरे असुरिंदे असुरराया जाव महिड्ढीए सो चेव बिइओ गमो भाणियव्यो जाव अग्गमहिसीओ सच्चे णं एसमठे। सेवं भंते ! सेवं भंते त्ति तच्चे गोयमे वायुभई अणगारे समणं भगवं महावीरं वंदइ नमसइ, वंदित्ता नमंसित्ता'जेणेव दोच्चे गोयमे अग्गिभूई अणगारे तेणेव उवागच्छइ उवागच्छित्ता दोच्चं गोयमं अग्गिभूई अणगारं वंदइ नमसइ वंदित्ता नमंसित्ता एयमटुं सम्मं विणएणं भुज्जोभुज्जो खामेइ। तए णं से दोच्चे गोयमे अग्गिभूई अणगारे तच्चेणं गोयमेणं वायुभूइणा अणगारे एयमठे सम्मं विणएणं भुज्जो-भुज्जो खामिए समाणे उवट्ठाए उठेइ उठ्ठित्ता तच्चेणं गोयमेणं वायुभूइणा अणगारेणं सद्धिं जेणेव समणे भगवं महावीरे तेणेव उवागच्छइ उवागच्छित्ता समणं भगवं महावीरं वंदइ नमसइ वंदित्ता नमंसित्ता जाव पज्जुवासए। द्रव्यानुयोग-(१) उ. गौतम ! इस प्रकार सम्बोधन करके श्रमण भगवान् महावीर ने तृतीय गौतम वायुभूति अनगार से इस प्रकार कहाहे गौतम! द्वितीय गौतम अग्निभूति अनगार ने तुम से जो इस प्रकार कहा यावत् प्ररूपित किया हे गौतम ! असुरेन्द्र असुरराज चमर ऐसी महान ऋद्धि वाला है, इत्यादि उसकी अग्रमहिषियों पर्यन्त का समग्र वर्णन (यहां कहना चाहिए) यह कथन सत्य है। हे गौतम ! मैं भी इसी प्रकार कहता हूं यावत् प्ररूपित करता हूं कि हे गौतम ! असुरेन्द्र असुरराज चमर महाऋद्धिशाली है, इत्यादि उसकी अग्रमहिषियों तक का समग्र वर्णन द्वितीय आलापक के समान कहना चाहिए। यह बात सत्य है। भंते ! यह इसी प्रकार है, भंते ! यह इसी प्रकार है, यों कहकर तृतीय गौतम वायुभूति अनगार ने श्रमण भगवान महावीर को वन्दन नमस्कार किया और वंदन नमस्कार करके जहां द्वितीय गौतम गोत्रीय अग्निभूति अनगार थे, वहां आए वहां आकर द्वितीय गौतम गोत्रीय अग्निभूति अनगार को वन्दन नमस्कार किया वंदन नमस्कार करके पूर्वोक्त बात की उपेक्षा के लिए उनसे विनय पूर्वक बार बार क्षमायाचना की। तदनन्तर द्वितीय गौतम (गोत्रीय) अग्निभूति अनगार उस पूर्वोक्त बात के लिए तृतीय गौतम वायुभूति के साथ सम्यक् प्रकार से विनयपूर्वक क्षमायाचना कर लेने पर अपने आसन से उठे और उठकर तृतीय गौतम गोत्रीय वायुभूति अनगार के साथ जहां श्रमण भगवान महावीर विराजमान थे वहां आए, वहां आकर श्रमण भगवान महावीर को वंदन नमस्कार किया और वंदन नमस्कार करके यावत् उनकी पुर्यपासना करने लगे। इसके पश्चात् तीसरे गौतम ! (गोत्रीय) वायुभूति अनगार ने श्रमण भगवान् महावीर को वंदन नमस्कार किया, वंदन नमस्कार करके इस प्रकार बोले'भंते ! यदि असुरेन्द्र असुरेन्द्रराज चमर इतनी बड़ी ऋद्धि वाला है यावत् इतनी विकुर्वणाशक्ति से सम्पन्न है, तब भंते ! वैरोचनेन्द्र वैरोचनराज बलि कितनी बड़ी ऋद्धि वाला है? यावत् वह कितनी विकुर्वणा करने में समर्थ है ? उ. गौतम ! वैरोचनेन्द्र वैरोचनराज बलि महाऋद्धिसम्पन्न है यावत् महाप्रभावशाली है। वह वहां तीस लाख भवनावासों तथा साठ हजार सामानिक देवों का अधिपति है। शेष समग्र वर्णन चमरेन्द्र के समान जान लेना चाहिए। विशेष-बलि वेरोचनेन्द्र दो लाख चालीस हजार आत्मरक्षक देवों का तथा अन्य बहुत से दूसरे देव देवियों का आधिपत्य करता हुआ यावत् विचरता है। चमरेन्द्र की विकुर्वणा शक्ति की तरह इसकी भी विकुर्वणा शक्ति का रूप जानना चाहिए। विशेष-बलि अपनी विकुर्वणा शक्ति से सातिरेक सम्पूर्ण जम्बूद्वीप को भर देता है। शेष सारा वर्णन विकुर्वणा नहीं करेगा पर्यन्त पूर्ववत् समझ लेना चाहिए। तए णं से तच्चे गोयमे वायुभूई अणगारे समणं भगवं महावीरं वंदइ नमसइ वंदित्ता नमंसित्ता एवं वयासी जइ णं भंते ! चमरे असुरिंदे असुरराया एमहिड्ढीए जाव एवइयं च णं पभू विकुवित्तए बली णं भंते ! वइरोयणिंदे वइरोयणराया के महिड्ढीए जाव केवइयं च णं पभू विकुवित्तए? उ. गोयमा ! बली णं वइरोयणिंदे वइरोयणराया महिड्ढीए जाव महाणुभागे। से णं तत्थ तीसाए भवणावाससयसहस्साणं, सट्ठीए सामाणियसाहस्सीणं सेसं जहा चमरस्स णवर-चउण्हं सट्ठीणं आयरक्खदेवसाहस्सीणं अन्नेसिं च जाव भुंजमाणे विहरइ। से जहानामए एवं जहा चमरस्स, णवरं-साइरेगं केवलकप्पं जंबूद्दीवे दीवं ति भाणियव्वं। सेसं तहेव जाव नो विउव्विस्सइ वा।
SR No.090158
Book TitleDravyanuyoga Part 1
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanhaiyalal Maharaj & Others
PublisherAgam Anuyog Prakashan
Publication Year1994
Total Pages910
LanguageHindi, Prakrit
ClassificationBook_Devnagari, Metaphysics, Agam, Canon, & agam_related_other_literature
File Size32 MB
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