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________________ ४१७ शरीर अध्ययन तत्थ णं जे ते बद्धेल्लया ते णं सिय संखेज्जा, सिय असंखेज्जा, जहण्णपए संखेज्जा, संखेज्जाओ कोडाकोडीओ तिजमलपयस्स उवरिं, चउजमलपयस्स हेट्ठा, अहवणं छट्ठो वग्गो पंचमवग्गपडुप्पण्णो, अहवणं छण्णउईछेयणगदाई रासी; उक्कोसपदे असंखेज्जा, असंखेज्जाहिं उस्सप्पिणि-ओसप्पिणीहिं अवहीरंति कालओ. खेत्तओ रूवपक्खित्तेहिं मणुस्सेहिं सेढी अवहीरंति, तीसे सेढीए काल-खेत्तेहिं अवहारो मग्गिज्जइ । असंखेज्जाहिं उस्सप्पिणी-ओसप्पिणीहिं कालओ, खेत्तओ अंगुलपढमवग्गमूलं तइयवग्गमूलपडुप्पण्णं । तत्थ णं जे ते मुक्केल्लया ते जहा ओरालिया ओहिया मुक्केल्लया। प. मणुस्साणं भंते ! केवइया वेउब्वियसरीरा पण्णत्ता ? उ. गोयमा ! दुविहा पण्णत्ता,तं जहा १.बद्धेल्लया य, २, मुक्केल्लया य। तत्थ णं जे ते बद्धेल्लया ते णं संखेज्जा, समए-समए अवहीरमाणा-अवहीरमाणा संखेज्जेणं कालेणं अवहीरंति णो चेवणं अवहिया सिया। तत्थ णं जे ते मुक्केल्लया ते णं जहा ओरालिया ओहिया मुक्केल्लया। आहारगसरीराजहा ओहिया।३ उनमें से जो बद्ध हैं, वे कदाचित् संख्यात और कदाचित् असंख्यात होते हैं। जघन्य पद में संख्यात होते हैं। संख्यात कोटाकोटी, तीन यमलपद के ऊपर तथा चार यमलपद से नीचे होते हैं। अथवा पंचमवर्ग से गुणित प्रत्युत्पन्न छठे वर्ग-प्रमाण होते हैं; अथवा छियानवे छेदन के बाद रही राशि जितनी संख्या है। उत्कृष्टपद में असंख्यात हैं। कालतः-वे असंख्यात उत्सर्पिणियों-अवसर्पिणियों से अपहत होते हैं। क्षेत्रतः-एक रूप जिनमें प्रक्षिप्त किया गया है, ऐसे मनुष्यों से श्रेणी अपहृत होती है, उस श्रेणी की काल और क्षेत्र से अपहार की मार्गणा होती है। कालतः-असंख्यात उत्सर्पिणी-अवसर्पिणी कालों से असंख्यात मनुष्यों का अपहार होता है। क्षेत्रतः-वे तीसरे वर्गमूल से गुणित अंगुल का प्रथम वर्गमूल प्रमाण होते हैं। उनमें जो मुक्त औदारिक शरीर हैं, उनके विषय में औधिक मुक्त औदारिक शरीरों के समान जानना चाहिए। प्र. भंते ! मनुष्यों के वैक्रिय शरीर कितने कहे गए हैं ? उ. गौतम ! वे दो प्रकार के कहे गए हैं, यथा १.बद्ध,२.मुक्त। उनमें जो बद्ध हैं, वे संख्यात हैं। समय-समय में वे अपहत होते-होते संख्यातकाल में अपहृत होते हैं; किन्तु वे कभी अपहृत नहीं किए गये हैं। उनमें से जो मुक्त वैक्रिय शरीर हैं, उनके विषय में औधिक औदारिक शरीरों के समान समझना चाहिए। इनके बद्ध-मुक्त आहारक शरीरों की प्ररूपणा औधिक आहारक शरीरों के समान समझनी चाहिए। मनुष्यों के बद्ध-मुक्त तैजस्-कार्मण शरीरों का कथन औदारिक शरीरों के समान करना चाहिए। दं. २२ वाणव्यन्तर देवों के बद्ध-मुक्त औदारिक और आहारक शरीरों का कथन नैरयिकों के समान जानना चाहिए। इनके वैक्रिय शरीरों का कथन भी नैरयिकों के समान है। विशेष-उन असंख्यात श्रेणियों की विष्कम्भसूची प्रतर के पूरण और अपहार से संख्यात योजनशतवर्ग-प्रतिभाग खण्ड है। इनके मुक्त वैक्रिय शरीरों का कथन औधिक औदारिक शरीरों की समान है। इनके बद्ध-मुक्त तैजस् और कार्मण शरीरों का कथन वैक्रिय शरीरों के समान समझना चाहिए। दं.२३ ज्योतिष्क देवों के बद्ध-मुक्त शरीरों का प्ररूपण भी इसी प्रकार है। तेया-कम्मया जहा एएसिंचेव ओरालिया।४ दं. २२. वाणमंतराणं जहा णेरइयाणं ओरालिया आहारगाय। वेउब्वियसरीराजहाणेरइयाणं, णवरं-तासि णं सेढीणं विक्खंभसूई संखेज्जजोयणसयवग्गपलिभागो पयरस्स। मुक्केल्लया जहा ओहिया ओरालिया। तेया-कम्मया जहा एएसिं चेव वेउव्विया। दं.२३ जोइसियाणं एवं चेव। १. अणु. कालदारे, सु. ४२३/१ २. अणु. कालदारे, सु. ४२३/२ ३. अणु. कालदारे, सु. ४२३/३ ४. ५. अणु. कालदारे, सु. ४२३/४ अणु. कालदारे, सु.४२४
SR No.090158
Book TitleDravyanuyoga Part 1
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanhaiyalal Maharaj & Others
PublisherAgam Anuyog Prakashan
Publication Year1994
Total Pages910
LanguageHindi, Prakrit
ClassificationBook_Devnagari, Metaphysics, Agam, Canon, & agam_related_other_literature
File Size32 MB
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