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________________ ( २२० - एवं जाव तसकाइए --जीवा. पडि. ३, सु. १०१ ११८. नवविह विवक्खया एगिंदियाइ जीवाणं कायट्टिई परूवणं- प. एगिदिए णं भंते ! एगिदिएत्ति कालओ केवचिर होइ? उ. गोयमा ! जहण्णेणं अंतोमुहत्तं, उक्कोसेणं वणस्सइकालो। प. बेइंदिए णं भंते ! बेइंदिए त्ति कालओ केवचिर होइ? उ. गोयमा ! जहण्णेणं अंतोमहत्तं उक्कोसेणं संखेज्जं कालं। एवं तेइंदिए विर चउरिदिए वि। प. णेरइए णं भंते !णेरइए त्ति कालओ केवचिर होइ? उ. गोयमा ! जहण्णेणं दस वाससहस्साई, उक्कोसेणं तेत्तीसं सागरोवमाई। प. पंचेदियतिरिक्खजोणिए णं भंते ! पंचेंदियतिरिक्व जोणिए त्ति कालओ केवचिरं होइ? उ. गोयमा ! जहण्णेणं अंतोमुहुत्तं, उक्कोसेणं तिण्णि पलिओवमाई पुवकोडि पुहुत्तमब्भहियाई। एवं मणूसे वि। देवा जहाणेरइया। प. सिद्धे णं भंते ! सिद्धे त्ति कालओ केवचिर होइ? उ. गोयमा ! साइए अपज्जवसिए। -जीवा. पडि.१, सु.२५६ ११९. सकाइय अकाइयजीवाणं कायट्टिई परूवणं प. सकाइए णं भंते ! सकाइए त्ति कालओ केवचिरं होइ? द्रव्यानुयोग-(१) ___ इसी प्रकार त्रसकाय पर्यन्त जानना चाहिए। ११८. नवविध विवक्षा से एकेन्द्रियादि जीवों की कायस्थिति का प्ररूपणप्र. भंते ! एकेन्द्रिय एकेन्द्रिय रूप में कितने काल तक रहता हो? उ. गौतम ! जघन्य अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट वनस्पतिकाल तक रहता है। प्र. भंते ! द्वीन्द्रिय द्वीन्द्रिय के रूप में कितने काल तक रहता है ? उ. गौतम ! जघन्य अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट संख्यात काल तक रहता है। त्रीन्द्रिय और चतुरिन्द्रिय के लिए भी इसी प्रकार कहना चाहिए। प्र. भंते! नैरयिक नैरयिक के रूप में कितने काल तक रहता है ? उ. गौतम ! जघन्य दस हजार वर्ष और उत्कृष्ट तेतीस सागरोपम तक रहता है। प्र. भंते ! पंचेन्द्रिय तिर्यञ्च योनिक पंचेन्द्रिय तिर्यञ्च योनिक के रूप में कितने काल तक रहता है ? उ. गौतम ! जघन्य अन्तर्मुहूर्त तक और उत्कृष्ट पूर्वकोटिपृथक्त्व अधिक तीन पल्योपम तक रहता है। इसी प्रकार मनुष्य के लिए भी कहना चाहिए। देवों का कथन नैरयिकों के समान करना चाहिए। प्र. भंते ! सिद्ध, सिद्ध के रूप में कितने काल तक रहता है ? उ. गौतम ! सादि अपर्यवसित काल पर्यन्त रहता है। ११९. सकायिक-अकायिक जीवों की कायस्थिति का प्ररूपण प्र. भंते ! सकायिक जीव सकायिक रूप में कितने काल तक रहता है? उ. गौतम ! सकायिक दो प्रकार के कहे गए हैं, यथा १. अनादिअनन्त, २. अनादि सान्त। प्र. भंते ! पृथ्वीकायिक जीव पृथ्वीकायिक रूप में कितने काल तक रहता है? उ. गौतम ! (वह) जघन्य अन्तर्मुहूर्त तक और उत्कृष्ट अंसख्यात काल तक (अर्थात्) काल की अपेक्षा असंख्यात उत्सर्पिणी अवसर्णिणी तक और क्षेत्र से असंख्यात लोक तक रहता है। इसी प्रकार अकायिक, तेजस्कायिक और वायुकायिक जीवों के लिए भी जानना चाहिए। प्र. भंते ! वनस्पतिकायिक जीव वनस्पतिकायिक रूप में कितने काल तक रहता है? उ. गौतम ! जघन्य अन्तर्मुहूर्त तक और उत्कृष्ट अनन्तकाल तक अर्थात् कालतः अनन्त उत्सर्पिणी अवसर्पिणी पर्यन्त उ. गोयमा ! सकाइए दुविहे पण्णत्ते, तं जहा १. अंणाईए वा अपज्जवसिए, २. अणाईए वा सपज्जवसिए। प. पुढविकाए णं भंते ! पुढविकाइए त्ति कालओ केवचिर होइ? उ. गोयमा ! जहण्णेणं अंतोमुहुत्तं, उक्कोसेणं असंखेज कालं, असंखेज्जाओ उस्सप्पिणी ओसप्पिणीओ कालओ, खेत्तओ असंखेज्जा लोगा। एवं आउ-तेउ-वाउक्काइया वि। प. वणफइकाइया णं भंते ! वणप्फइकाए त्ति कालओ केवचिरं होइ? उ. गोयमा ! जहण्णेणं अंतोमुहत्तं, उक्कोसेणं अणंतं कालं५ अणंताओ उस्सप्पिणि ओसप्पिणीओ कालओ, १. २. ३. उत्त. अ.३६, गा.१३३ उत्त. अ.३६, गा.१४२ उत्त. अ.३६, गा. १५२ ४. उत्त. अ.३६, गा. १६७ ५. जीवा. पडि.९.सु.२५८
SR No.090158
Book TitleDravyanuyoga Part 1
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanhaiyalal Maharaj & Others
PublisherAgam Anuyog Prakashan
Publication Year1994
Total Pages910
LanguageHindi, Prakrit
ClassificationBook_Devnagari, Metaphysics, Agam, Canon, & agam_related_other_literature
File Size32 MB
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