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________________ दि० जैन व्रसोधापन संग्रह । धन धान्य सदास्तु । चन्द्रप्रभ, वासुपूज्य मल्लि, वर्द्धमान, पुष्पदंत, शीतल, मुनिसुव्रत, नेमिनाथ पार्श्वनाथ, इत्यनेन मंत्रण नवग्रहार्थ गंधोदकधारावर्षणम् ॥ ॥ इति शांतिमंत्र सम्पूर्णः ।। सहस्रनाम व स्वस्ति विधान । सकली करण किये बाद जिनसेनाचार्य कृत सहस्रनाम बोल एक एक दशकके दश अर्घ चढ़ाना । सहस्र नामके पाठके पश्चात् नीचे प्रमाण स्वस्ति विधान पढ़ना । श्रीमज्जिनेन्द्रमभिवन्द्य जगत्त्रयेशं स्याद्वादनायकमनन्तचतुष्टयाह । श्वी मूलसंघसुदृशां सुकृतैकहेतु जैनेन्द्रयज्ञविधिरेषमयाऽभ्यधायिं ॥ १। स्वस्ति त्रिलोकगुरवे जिनपुङ्गवाय स्वस्ति स्वभावमहिमोदय सुस्थिताय । स्वस्ति प्रकाशसहजोजितदृड्भयाय स्वस्ति प्रसन्नललिताद्भुतवैमवाय ॥२॥ स्वस्त्युक्छल द्विमलबोधसुधाप्लवाय स्वस्ति स्वभावपरभाव विभासकाय । स्वस्ति त्रिलोकविततैकचिदुद्गमाय स्वस्ति त्रिकालसकलायतविस्तृताय ॥३॥ द्रव्यस्य शुद्धिमधिगम्य यथानुरूपं भावस्थ शुद्धिमधिकामधिगन्तुकामः ।
SR No.090154
Book TitleDigambar Jain Vratoddyapan Sangrah
Original Sutra AuthorN/A
AuthorFulchand Surchand Doshi
PublisherDigambar Jain Pustakalay
Publication Year1986
Total Pages408
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Ritual_text, & Ritual
File Size20 MB
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