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________________ दि० जन व्रतोद्यापन संग्रह | जला दिचन्द मसंदात पुष्पचारु । मैवेद्यदीपवर धूपफलैर्महार्घ ॥ नारायणो विजयकीर्तिगुणप्रसादात् । यच्छत्यनर्धममलं मुनिपुङ्गवेभ्यः || ॐ ह्रीं चतुर्दशगुणस्थानस्थित भव्यजीवेभ्यो महाघं० । २१० ] अथ जयमाला | सिरि गुणगण ठाणा अमिय समाणा, भवियण मुनिवर बोधकरा । अइ सुमइ विहाणा मुणिप्रणभाणा, कुमविणासण दुरियहरा ॥ १ ॥ पठमं मिथ्यातह ठाण यहि भव्व राशि अनंत जिणेसर देव का | चउदस बावण गणहर मुणिवर भव्य लहा ते बन्दामिय निम्मल निस्सय सिद्धि पहा || २ || सासादण वर दिठि भणा एक सम कोड़ि चार । जिणेसर देव का || चउदस बावण गणहर मुनिवर भव्य लहा ते वन्दामिय निम्मल निस्सय सिद्ध पहा || ३ || तिदिय ठाणे गाण भव्ववरा दो पंचासय कोढ़ि जिणेसर देव का | चउदसि बावण० ॥ ४ ॥
SR No.090154
Book TitleDigambar Jain Vratoddyapan Sangrah
Original Sutra AuthorN/A
AuthorFulchand Surchand Doshi
PublisherDigambar Jain Pustakalay
Publication Year1986
Total Pages408
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Ritual_text, & Ritual
File Size20 MB
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