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________________ दि० जन व्रतोद्यापन संग्रह । [ १९९ वर नाभिराज नत नर समाज, कृत नामि निवर्तन सुख समाज !|८|| घत्ता । कुलकर वर देवा सुरकृत सेवा, भांतु वरिष्टसुगुणनिकरा । सु चतुर्दश संख्या मत बहु कांक्षा, भोगधराज सु सौख्यकरा ॥ ॐ ह्रीं चतुर्दशकुलकरेभ्यो जयमाला महाघ । शांति समृद्धि वरसौख्यवृद्धि, बुद्धि सुलब्धि परमार्थसिदि । स्फूर्ति सुकीर्ति वरपूजकाना, करोति नित्यं कुलभृत्समूहः ।। इत्याशीर्वादः । छप्पा । मति श्रुति सन्मति नाम क्षेमङ्कर शेमन्धर जाणो । सीमङ्कर सुख धाम सीमन्धर बहु वखाणो ॥ विमलबाह वर चक्ष्व यशस्वदभिचन्द्र मनोहर । चन्द्राभक मरुदेव प्रसेनजित नाभि नरवर ॥ एह चतुदेश कुलकरा भोगभूमिज कुल उदरण । नारायण एवं वदत आर्यलोक बहु सुखकरण ॥ इतिश्री चतुर्दशकुलकर पूषा सम्पूर्ण ।
SR No.090154
Book TitleDigambar Jain Vratoddyapan Sangrah
Original Sutra AuthorN/A
AuthorFulchand Surchand Doshi
PublisherDigambar Jain Pustakalay
Publication Year1986
Total Pages408
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Ritual_text, & Ritual
File Size20 MB
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