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________________ ३२ समन्तभद्र- भारती उनका प्रयास है कि प्रसिद्ध इतिहासवेत्ता पं० जुगलकिशोरजी मुख्तार द्वारा खोजपूर्ण अनेकविध प्रमाणोंसे निर्णीत स्वामी समन्तभद्रके विक्रम सं० दूसरी-तीसरी शताब्दी के समय को वि० सं० सातवीं-आठवीं शताब्दी सिद्ध किया जाय । यहाँ उनकी स्थापनाओंको देकर उनपर सूक्ष्म और गहराई से विचार किया जाता है : ( १ ) आप्तपरीक्षागत प्रयोगोंसे सिद्ध है कि सूत्रकार शब्द केवल ० उमास्वामी के लिए ही प्रयुक्त नहीं होता था, दूसरे आचार्योंके लिए भी उसका प्रयोग किया जाता था । ( २ ) तत्त्वार्थश्लोकवार्तिकगत तत्त्वार्थसूत्र के प्रथम सूत्रकी अनुपपत्तिउपस्थापन और उसके परिहारकी चर्चासे स्पष्ट कलित होता है कि विद्यानन्दके सामने तत्त्वार्थसूत्र के प्रारम्भ में 'मोक्षमार्गस्य नेतारम्' इलोक नहीं था । ( ३ ) अष्टसहस्री तथा आप्तपरीक्षाके कुछ विशेष उल्लेखोंसे सिद्ध होता है कि इसी श्लोकके विषयभूत आप्तकी मीमांसा समन्तभद्रने अपनी आप्तमीमांसा की । समीक्षा : इन तीनों स्थापनाओंकी यहाँ समीक्षा की जाती है । प्रथम स्थापनाके समर्थन में विद्यानन्दके ग्रन्थोंसे कोई ऐसा उल्लेख-प्रमाण प्रस्तुत नहीं किया, जिसमें उन्होंने उमास्वामीके अतिरिक्त अन्य किसी आचार्यको सूत्रकार या शास्त्रकार कहा हो । तथ्य तो यह है कि विद्यानन्दने अपने किसी भी ग्रन्थ में उमास्वामी के सिवाय अन्य किसी ग्रन्थकर्ताको सूत्रकार या शास्त्र- कार नहीं लिखा । जहाँ कहीं अन्य ग्रन्थकर्ताओंके उन्होंने अवतरण दिये हैं उन्हें उन्होंने उनके नामसे या ग्रन्थ नामसे या केवल 'तदुक्तम्' कहकर उल्लेखित किया है, सूत्रकार या शास्त्रकारके नामसे नहीं । सूत्रकार या शास्त्रकार शब्दका प्रयोग केवल उमास्वामी के लिए किया है । इस सम्बन्धमें हमने विद्यानन्दके ग्रन्थोंपर से खोजकर ३३ अवतरण उदाहरणार्थ
SR No.090131
Book TitleDevagam Aparnam Aaptmimansa
Original Sutra AuthorSamantbhadracharya
AuthorJugalkishor Mukhtar
PublisherVeer Seva Mandir Trust
Publication Year1967
Total Pages196
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, P000, & P015
File Size12 MB
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