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________________ [दव्वसंगठ जीव है [ दु] और [ जस्स ] जिस के [ चेयणा ] चेतना है [ सो ] वह [ णिच्छयणयदो ] निश्चयनय से [ जीवो ] जीव है ।। 3 ॥ टीकार्थ: विवहारा सो जीवो व्यवहार नय से वह जीव कहलाता है। वह कौन ? जस्स जिस के होते हैं। क्या होते हैं? चदुपाणा चार प्राण | किस नाम वाले ? इंदियबलमाउआणपाणो य इन्द्रिय प्राण, बल प्राण, आयु प्राण और श्वासोच्छवास प्राण, इन चार भेद से। फिर दश प्राण किस प्रकार हैं ? पंच इन्द्रिय प्राणादि गाथा प्रथम सूत्र के व्याख्यान में कही गयी है । इन्द्रिय संज्ञी पंचेन्द्रिय जीव की अपेक्षा से कही गयी है, न कि सम्पूर्ण जीवों की अपेक्षा से कौन से काल में वे चार प्राण होते हैं? तिक्काले अतीतअनागत- वर्तमान इन तीनों ही कालों में एकेन्द्रियों की अपेक्षा से ये कथन है णिच्छवणय दो दु पुनः निश्चयनय से चेयणा जस्स चेतना का उदय है I जिस के ॥ 3 ॥ भावार्थ : जिस के त्रिकाल में इन्द्रिय-बल- आयु- श्वासोच्छ्वास ये चार प्राण हैं, वह व्यवहारनय से जीव है। जिस में चेतना है, वह जीव है - यह निश्चयनय का कथन है । 3 ॥ पाठभेद : विवहारा चेयणा ववहारा चेदणा - 9 उत्थानिका : तस्य जीवस्य उपयोगद्वयमाह गाथा : उवओगो दुवियप्पो दंसणणाणं च दंसणं चदुधा । चक्खु - अचक्खु - ओही दंसणमह केवलं पणेयं ॥ 4 ॥ - 113 11 टीका : उवओगो दुवियप्पो उपयोगो द्विविधविकल्पः कथमित्याह - दंसणणाणं च दर्शनोपयोगी ज्ञानोपयोगश्च तत्र दर्शनोपयोगः - चदुधा 3
SR No.090129
Book TitleDravyasangrah
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandramuni
PublisherBharatkumar Indarchand Papdiwal
Publication Year2000
Total Pages121
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, & Religion
File Size2 MB
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