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________________ (७९) चेतन 6 यौँ ही भ्रम ठान्यो, ज्यों मृग मृगतृष्णा जल जान्यो। ज्यौं निशितममैं निरख जेवरी, भुजंग मान नर भय उर आन्यो। ज्यौं कुध्यान वश महिष मान निज, फँसि नर उरमाहीं अकुलान्यौ। यो चिर मोह त्रिधा परयो, तेरी से ही रूप भुलान्यो॥१॥ तोय तेल ज्यौँ मेल न तनको, उपज खपज मैं सुखदुख मान्यो। पुनि परभावनको करता है, मैं तिनको निज कर्म पिछान्यो ॥२॥ नरभव सुथल सुकुल जिनवानी, काललब्धि बल योग मिलान्यो। 'दौल' सहज भज उदासीनता, तोष-रोष दुखकोष जु भान्यो ॥३॥ हे चेतन ! तू भ्रमवश भटक रहा है, जैसे मृग जल की चाह में, मिट्टी के ऊपर चमकते कणों को ही जल समझ कर भागता है; जैसे रात्रि के गहरे अँधेरे में रस्सी को साँप समझकर मनुष्य का हृदय भय से भर जाता है उसी भाँति तू भो भ्रम को धारणकर भटक रहा है। जैसे खोटे ध्यानवश भैंसें का ध्यान करनेवाला अपने को मोटा व बलवान भैंसा मानता हुआ सोचने लगता है, समझने लगता है, चिन्ता करने लगता है कि वह इस छोटे-से द्वार से बाहर कैसे निकल सकता है? और इसी चिन्तन के कारण अंतरंग में आकुलित होता है; वैसे ही तू अनादि से मोहवश अविद्या में रमकर अपना ही स्वरूप भूल गया है। जैसे पानी और तेल का मेल नहीं होता उसी भौत इस शरीर और आत्मा का भी मेल नहीं है फिर भी तू इस शरीर के उत्पन्न होने व विनाश होने में सुख व दुःख मानता है। फिर फिर इन पर-भावों का कर्ता होकर, उनको अपना ही कर्म पहचानता है, समझता है । यह नरभव, यह श्रेष्ठ क्षेत्र, अच्छा कुल और जिनवाणी - ये सब संयोग काललब्धि के बल से मिले हैं । दौलतरामजी कहते हैं कि अब तू विरागता को भज, स्वीकार कर और तुष्टि व विरोध को, क्रोध को, राग-द्वेष को दुःख की खान-भंडार जान। तोय = पानी; खपज - मृत्यु, विनाश होना; तोष - तुष्टि, रोष - विरोध, कोप; भान्यो- जानना। दौलत भजन सौरभ
SR No.090128
Book TitleDaulat Bhajan Saurabh
Original Sutra AuthorN/A
AuthorTarachandra Jain
PublisherJain Vidyasansthan Rajasthan
Publication Year
Total Pages208
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Devotion, & Worship
File Size3 MB
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