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________________ ७४ छहढाला (२) अशरण भावना सुर असुर खगाधिप जेते, मृग ज्यों हरि काल दलेते मणि मन्त्र-तन्त्र बहु होई, मरते न बचावै कोई ||४|| शब्दार्थ - सुर असुर खगाधिप इन्द्र, नागेन्द्र, विद्याधर । मृग हरिण | ज्यों = जैसे | हरि सिंह । काल = गौत: दलेते नष्ट कर देता है। = = - 1 अर्थ -- जैसे हिरण को सिंह नष्ट कर देता हैं वैसे ही इन्द्र-नरेन्द्र आदि - को भी मृत्यु नष्ट कर देती है । मृत्यु से मणि, मन्त्र-तन्त्र आदि कोई भी बचा नहीं सकता है । प्रश्न १ – असुर किसे कहते हैं ? उत्तर-----अधोलोक की पहली पृथ्वी के पंकभाग में रहनेवाले भवनवासी देव में एक 'असुरकुमार' भी हैं। प्रश्न २ --- सुर किसे कहते हैं ? उत्तर --- देवगति नामकर्म का उदय होने पर अणिमा, महिमा, लघिमा, गरिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशत्व, वशित्व – इन आठ ऋद्धियों के कारण द्वीप समुद्रों में इच्छानुसार जो विविध क्रीड़ाएँ करते हैं वे देव कहलाते हैं । प्रश्न ३ --- मरने से कोई बचा सकता है क्या ? उत्तर- -" मरते न बचावे कोई । " - प्रश्न ४ – मन्त्र किसे कहते हैं ? - उत्तर- - जो मन और मनोकामना की रक्षा करे, उसे मन्त्र कहते हैं । प्रश्न ५ -- तन्त्र किसे कहते हैं ? उत्तर - प्रयोग के साधन को तन्त्र कहते हैं । प्रश्न ६ – अशरण भावना किसे कहते हैं ? उत्तर - संसार में कोई शरण नहीं है और मरने से कोई बचाने वाला नहीं हैं - ऐसा चिन्तन करना अशरण भावना है ।
SR No.090123
Book TitleChahdhala 1
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDaulatram Kasliwal
PublisherBharat Varshiya Anekant Vidwat Parishad
Publication Year
Total Pages118
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Religion
File Size2 MB
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