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________________ ७३६] चरणानुयोग कम्फ ततो मनात गुराया फलं ३३३. प० - कायगुत्तयाए णं भरते ! जीवे कि जणय ? थी। -- मा. सु. १, अ. ४, उ. ४, सु. १४४-१४५ उनसे अवश्य ही निवृत्त होने । कायगुप्ति का फल उ०- कायगुयाए में संवरं जणयह संवरेगं कायगुत्ते पुणो पावासवनिरोहं करे ॥ कायसमाहारणयाए फलं३३४.५० -कायसमाहारणयाए णं भन्ते ! जो कि जगह ? उ०- कायसमाहारणयाए णं चरितवे विसोहेड । दिसा महणायचरितं विमोच महत्वाचरितं विसोहेला चलारि केवलकम्मसे वेद । तपच्छा साह, बुजाइ मुख्य परि निवाए सक्खाणमन्तं करे । इंनियणिग्गह फलं ३३५० सोइन्दिय निरगणं भन्ते ! जीवे कि जनपद ? उ०- सोइन्दिय निम्यहेणं मणुग्रामम्ने सहं राम शेस निग्गहं जगह, तरपच्चइयं कम्म न बन्छ, पुध्वबद्ध निज्जरे । - उत्त.. २६, सु. ५७ के आश्रमों का निरोध कर देता है । कायसमाघारणा का फल ३३४. अ० भन्ते ! काय साधारणा (संयमयोगों में काया को भली-भांति लगाने से जीव क्या प्राप्त करता है ? उ०- काय रामाधारणा से वह चरित्रपर्यो (चार के प्रकारों को विशुद्ध करता है नारियों को विशुद्ध कर वाया चारित्र को प्राप्त करने योग्य वृद्धि करता है या ख्यात चारित्र को विशुद्ध कर केवल के विद्यमान चार कर्मो ( आयुष, वेदनीय, नाम और गोत्र ) को क्षीण करता है। उसके --सत. अ. २६, सु. ६० पश्चात् सिद्ध होता है, वुद्ध होता है, मुक्त होता है परिनिर्वाण की प्राप्त होता है और सब दुःखों का अन्त करता है । इन्द्रियनिग्रह का फल - ३३५. प्र० भन्ते ! श्रोत्रेन्दिय का निग्रह करने से जीव क्या प्राप्त करता है ? उ०- श्रीन्दिय के निग्रह से वह मनोश और अमनोज्ञ शब्दों में होने वाले राग और द्वेष का निग्रह करता है। वह राग-द्वेष निमित्तक कर्म बन्धन नहीं करता और पूर्व बद्ध कर्म को क्षीण करता है । ! ०न्तेन्द्रिय का निग्रह करने से दी क्या प्राप्त करता है ? उ०- चक्षु इन्द्रिय के निग्रह करने से वह मनोज और मनोरूमों में होने वाले राम और कान करता है। वह रामन्द्रयनिमित बन्धन नहीं करता और पूर्व-बढ कर्म को क्षीण करता है। प्र० भन्ते ! धाम- इन्द्रिय का निग्रह करने से जीव क्या प्राप्त करता है ? प० क्खिन्दियनिग्रहेण भन्ते 1 जीवे कि जलय । येसु रागवोस निग्गहं जणयह, तप्यन्वद्दयं कम्मं न बन्ध पुरुवयं च निज्जरे । ०निगं ममुप्रामने प० पाणिन्दिय निरगणं भन्ते ! जीवे बैंक जनयद्द ? उ०- ग्रामदिनि मामले www.DANG राम-बोस निहं जणयह, सरपण्यइथं कथं न मन्धइ, पुश्ववसं निज्जरेह । प० - विम्मिदिय निग्गणं सन्ते ! जीवे कि जनपद ? सूत्र ३३२-३३५ कर्म अपना फल अवश्य देते हैं, यह जानकर ज्ञानी पुरुष काय गुप्ति का फल - २२२] [२०] अन्ते! नाय काय के प्रयोग से जीव क्या प्राप्त करता है ? काय गुप्ति से यह संदर (अशुभ प्रवृत्ति के निरोध) को प्राप्त होता है । संवर प्राप्त कायगुप्त जीव फिर पाप कर्म उ० घ्राण इन्द्रिय के निग्रह से वह मनोज और अमनोज्ञ गन्धों में होने वाले राग और द्वेष का निग्रह करता है। वह राग-द्वेष निमित्तक कर्मबन्धन नहीं करता और पूर्व वद्ध कर्म को क्षीण करता है । प्र०—भन्ते ! जिह्वा - इन्द्रिय का निग्रह करने से जीव क्या प्राप्त करता है ?
SR No.090119
Book TitleCharananuyoga Part 1
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanhaiyalal Maharaj
PublisherAgam Anuyog Prakashan
Publication Year
Total Pages782
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Conduct, Agam, Canon, H000, H010, & agam_related_other_literature
File Size23 MB
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