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________________ ५६६] धरणानुयोग उत्पादन दोषों का वर्जन और सुख आहार ग्रहण का उपदेश सूत्र ६२६-६२७ उप्पायणा बोस यज्जण सुद्ध आहार गहणस्स य उवएसो- उत्पादन दोषों का वर्जन और शुद्ध आहार ग्रहण का उपदेश१२६. न निसज्ज-कहा-पओयणक्या ओवणियं ति । १२६. गहस्थ के घर में बैठकर धर्मकथा निमित्त कहानियाँ कहकर भिक्षा ग्रहण नहीं करनी चाहिए । न तिपिच्छा-मंत-मूल - भेसज्जकज्जहेउ । चिकित्सा, मन्त्र, जड़ीबूटी, औषध निर्माण आदि के प्रयोग बताकर भिक्षा ग्रहण नहीं करनी चाहिए। न लक्खणप्याय सुमिण जोइस-निमित्तकह-कप्पउत्तं । शुभाशुभ लक्षण, उत्पात, भूकम्पादि, स्वप्न क्ल, ज्योतिषमुहूर्त कथन निमित्तकथन, भविष्यकथन, कौतुक-जादू के प्रयोग बताकर भिक्षा ग्रहण नहीं करनी चाहिए, नवि डंभणाए. नवि रक्षणाए, नवि सासणाए। दम्भ करके, आत्मरक्षा के प्रयोग की शिक्षा देकर, अनुनवि भण-रक्खण-सासणाए मिक्खं गवेसियन्वं । शासन करने का शिक्षण देकर भिक्षा ग्रहण नहीं करनी चाहिए। नवि वणाए, नवि माणणाए, नदि पूपणाए। वन्दन करके, सन्मान करके, पूजा करके भिक्षा ग्रहण नहीं नवि वरण-माणण-पूयणाए भिक्ख मवेसियध्वं । करनी चाहिए। नवि होलणाए नवि निवणार नवि गरहणाए । अपमान करके, निन्दा करके, अपकीति करके भिक्षा ग्रहण नवि होलण-निदण-गरहणाए मिक्खं मवेसियब । नहीं करनी चाहिए। नवि भेसणाए नवि तज्जणाए नवि तालणाए । भय दिन्जा करके, तर्जना करके, ताडना करके भिक्षा ग्रहण नदि भेषण-तज्जण-तालगाए क्विं गवेसि यक्ष । नहीं करनी चाहिए। नवि गारवेक नवि कुहणयाए नवि बणीमयाए । गर्न करक, क्रोध करके, दीनता प्रकट करके भिक्षा ग्रहण नवि गारव कुहण-वणीच्याए भिक्ष गवेसिपव्वं । नहीं करनी चाहिए। नवि मित्तयाए नवि पत्थमाए नवि सेवणाए । मित्रता करके, प्रार्थना करके, सेवा करके भिक्षा ग्रहण नहीं नवि मित-पत्थण-सेवणाए भिक्ख गनेसियव्यं । करनी चाहिए। अन्नाए, अगदिए, अदुट्ट. अवीगे, अविमणे, अकलुणे, अवि- अज्ञात कुल से भिक्षा ग्रहण करने वाला, नरस आहार करने सातो, अपरिसंतजोगी जयण-घडण-करण-चरिय-विणयगुण- में अनासक्त, नीरस आहार दाता से अद्वेष भाव वाला. आहार जोगसंपउत्ते भिक्खू सिक्खेसणाए निरते। न मिलने पर भी अदीन, आहार नहीं मिलने पर भी अग्लान -पण्ह. सु. २, अ.१, सु.५ मन वाला, दयनीय भाव रहित, विषाद रहित, अशुभयोग गहिल प्राप्त संयम साधना मे प्रयत्नशील, सुत्रानुसार अर्थ घटाने में उपयुक्त, करण चरण एवं विनय गुणयुक्त भिक्षु भिक्षा की एपणा में तत्पर रहे। धाइ पिडाइ भुजमाणस्स पायच्छित्त सुत्ताई धातृपिंडादि दोषयुक्त आहार करने वाले के प्रायश्चित्त सूत्र-- ६२७. १. जे भिक्खू घाई-पिट भुंजइ, भुजत वा साइज्जइ । १२७. (१) जो भिक्षु धातृपिंड भोगता है, भोगवाता है. भोगने वाले का अनुमोदन करता है। २. जे भिक्खू दूई पिङ भुंजा, मुंज या साइज्जह । (२) जो भिक्षु दृतिपिंड भोगता है, भोगवाता है, भोगने वाले का अनुमोदन करता है। ३. जे भिक्खू णिमित्त पिडं मुंजड, मुंजत वा साइजह। (३) जो भिक्षु कालिक निमिन बहकर अहार भोयत्ता है, भोगवाता है, भोगने वाले का अनुमोदन करता है। ४. जे भिक्खू आजीविय-पिड मुंजद, मुंजतं वा साहज्जइ। ४) जो भिक्षु आजीविक (आजीविक के प्रयोग बताकर लिया हुआ आहार) पिंड भोगता है. भोगवाता है. भोगने वाले का अनुमोदन करता है।
SR No.090119
Book TitleCharananuyoga Part 1
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanhaiyalal Maharaj
PublisherAgam Anuyog Prakashan
Publication Year
Total Pages782
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Conduct, Agam, Canon, H000, H010, & agam_related_other_literature
File Size23 MB
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