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________________ ४४०] वरगानुयोग सुली होने के उपाय का मरूपण सूत्र ६६८-६७१ इए लोगे दुहावह विक, परलोगे य चुहं हाम्हं। परिग्रह इस लोक में दुःख देने वाला है और परलोक में भी विद्धसमधम्ममेव तं, इति विज को गारमावसे ?।। दुःख उत्पन्न करने वाला है, तथा वह विध्वंसक (विनश्वर) -सूप. सु. १, भ. २, मा.-१० स्वभाव वाला है, ऐसा जानने वाला कोन पुरुष गृह-निवास कर सकता है? सुहोवाय परवणं सुखी होने के उपाय का प्ररूपण६६६. आयावयाही चय सोगमल्ल. कामे कमाही कमियं खु दुक्खं । ६६६. अपने को तपा। सुकुमारता का त्याग कर । काम-विषयछिदाही बोसं विणएज्ज रागं, एवं सुही होहिसि संपराए ॥ बासना का अतिक्रम कर। इससे दुःख अपने-आप अतिक्रांत हो -दस. अ. २, मा. ५ जाएगा । द्वेष भाव को छिन्न कर, राग-माद को दूर कर । ऐसा करने से तू संसार (इहलोक और परलोक) में सुखी होगा। तहाए लयोवमा - तृष्णा को लता की उपमा-- ६७०. ५०- अन्तोहिपय-संमूया, लया बिटुइ गोयमा ! ६७०, प्रo- "हे गौतम ! हृदय के भीतर उत्पन एक लता है। फलेह विसमक्खोणि सा उ उदरिया कहं ? ॥ उसके विष-तुल्य फल लगते हैं। उसे तुमने कैसे उखाड़ा ?" उ-त लयं सत्यसो छिता, उद्धरिता समूलिय। उ.-"उस लता को सर्वथा काटकर एवं जड़ से उखाड़कर विहरामि अहानायं मुक्को मि विसमक्खणं ॥ नीति के अनुसार मैं विचरण करता हूँ। अतः मैं विषफल खाने से मुक्त हूँ।" प०-लया य इइ का वृत्ता, केसी गोयममम्बवी । प्र-केशी ने गौतम को कहा-"बह लता कौन सी है?" केसिमेवं दुबतं तु. गोयमो इणमम्बयो । केशी के पूछने पर गौतम ने इस प्रकार कहा30-अवलम्हा लया वृत्ता, भीमा भीमफलोदया । 30.-"भवतृष्णा ही भयंकर लता है। उसके भयंकर परितमरित्त जहानायं, विरामि महामुणी ॥ पाक वाले फल लगते हैं। हे महामने ! उसे जड़ से उखाड़कर -उत्त. अ. २३, गा. ४५-४८ में नीति के अनुसार विचरण करता हूँ।" अट्टप्लोलुपा दंड समारभति अर्थलोलुप हिंसा करते हैं६७१. अहो य राओ में परितप्पमागे कालाकाससमुट्ठायो संजोगट्ठी ६७१. (जो विषयों से निवृत्त नहीं होता) बह रात-दिन परितप्त अट्ठालोभी वालपे महसक्कारे विणिविट्ठचित्ते एत्थ सत्थे पुणो रहता है । काल या अकाल में (घन आदि के लिए) सतत प्रयत्न करता रहता है। विषयों को प्राप्त करने का इच्छुक होकर वह धन का लोभी बनता है। चोर व लुटेरा बन जाता है। उसका चित्त व्याकुल व चंचल बना रहता है और वह पुनः पुनः शस्त्र प्रयोग (हिंसा व संहार) करता रहता है। से आतबले, से शातबले, से मिसबले से पेच्चखले, से वेवाले, बह आत्मबल (गरीर बन), ज्ञातिबल. मित्र बल, प्रत्य बल, से रायबले, से चोरबले, से अतिथिबले, से किवगवले, से देवबल, राजबल, चोरबल अतिथिबल, कृपणबल और श्रमणसमणवले. बल का संग्रह करने के लिए अनेक प्रकार के कार्यों (उपक्रमों) द्वारा दण्ड (हिंसा) का प्रयोग करता है। इन्वेहि विश्वरूहि कज्जेहि समादाणं, संपेहाए भया कोई व्यक्ति किसी कामना के लिए दण्ड का प्रयोग करता है काउजति, पायमोक्खो ति मण्णमाणे अनुषा आसंसाए। (अथवा किसी अपेक्षा से) कोई भय के कारण हिंसा आदि करता है। कोई पाप से मुक्ति पाने की भावना से (यज्ञ-बलि आदि द्वारा) हिसा करता है। कोई किसी आशा (अप्राप्त को प्राप्त करने की लालसा) से हिंसा-प्रयोग करता है। पुणो।
SR No.090119
Book TitleCharananuyoga Part 1
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanhaiyalal Maharaj
PublisherAgam Anuyog Prakashan
Publication Year
Total Pages782
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Conduct, Agam, Canon, H000, H010, & agam_related_other_literature
File Size23 MB
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