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________________ ३४४ घरगानुयोग मैथुन सेवन के संकल्प से व्रण की चिकित्सा करने के प्रायश्चित्त सूत्र पूत्र ४६३ तं सेवमाणे भावमा पाउम्मासियं परिहारट्ठाण उग्धाइयं। -नि. र. १५, सु. १२४ उसे चातुर्मासिक उद्घातिक परिहारस्थान (प्रायश्चित्त) आता है। मथुन के संकल्प से स्व-शरीर को चिकित्सा के प्रायश्चित्त-२ मेहुणवडियाए वण तिमिछाए पायच्छित्त सुताई- ४६३. जे मिक्ख माजग्गामस्स मेहुणवदियाए अपणो कार्यसि पणं मामम्जेज वा, पमनेज घा, आमज्जतं वा, पमजंतं वा साइजह । जे मिक्खू माउणामस्स अप्पणो कार्यसि वणं संबाहेज वर, पलिमज्ज वा, संबात वा पलिम वा साइज । मधुन सेवन के संकल्प से व्रण की चिकित्सा करने के प्रायश्चित्त सूत्र - ४६३. जो भिक्षु माता के समान है इन्द्रियाँ जिसकी (ऐसी स्त्री से) मैयुन सेवन का संकल्प करके अपने शरीर पर हुए वण का मार्जन करे, प्रमार्जन करे, मार्जन करवावे, प्रमार्जन करवाये, मार्जन करने वाले का, प्रमार्जन करने वाले का अनुमोदन करे। __ जो भिक्षु माता के समान है इन्द्रियाँ जिसको (ऐसी स्त्री से) मधुन संबन का सबलप बार अपने शरीर पर हुए व्रण का मदन करे, प्रमदन करे, मर्दन करवावे, प्रमर्दन करवावे, मर्दन करने वाले का, प्रमर्दन करने वाने का अनुमोदन करे। जो भिक्षु माता के समान है इन्द्रियो जिसकी (ऐसी स्त्री से) मैथुन सेवन का संकल्प करके अपने शरीर पर हुए व्रण पर तेल-यावत्-मक्खन, मले, बार-बार मले, मलवावे, बार-बार मलवावे, मलने वाले का, बार-बार मलने वाले का अनुमोदन करे । जो भिक्षु माता के समान है इन्द्रियाँ जिसकी (ऐसी स्त्री से) मैथुन सेवन का संकल्प करके अपने शरीर पर हुए व्रण पर लोध,-यावत्-वर्ण का, उबटन करे, बार-बार उबटन करें, उबटन करवावे, बार-बार उबटन करवावे, उबदन करने वाले का, बार-बार उबटन करने वाले का अनुमोदन करे। जे भिवखू माउग्गामस्स मैहणारयाए अपणो कार्यप्ति वणं तेल्लेण बा-जाव-गवणीएणं वा, मखेज्ज वा, मिलिगेज वा, मक्खेत बा, मिलिगेंतं वा साइम्जा। मे मिळू माजगामस्स मेहनखियाए अपणो कार्यसि वणं लोदेण बा-जाव-बणेश वा, उहलोस्सेज्ज वा, उबट्टज्ज वा, उहलोलंसं वा, जव्वत वा साइग्जद । १ यहाँ व्रणचिकित्सा, गण्डादिचिकित्सा और कृमिचिकित्सा के सूत्र मोघक्रम से लिए गये हैं। विभूषा की दृष्टि से कोई कहीं चिकित्सा न करता है, न करवाता है, चिकित्सा का उद्देश्य केवल स्वास्थ्य लाभ है। चिकित्सा में औषधादि के प्रयोग से कृमियों की हिंसा अनिवार्य है अतः यहाँ ये उसी हिंसा के प्रायश्चित्त सूत्र हैं।
SR No.090119
Book TitleCharananuyoga Part 1
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanhaiyalal Maharaj
PublisherAgam Anuyog Prakashan
Publication Year
Total Pages782
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Conduct, Agam, Canon, H000, H010, & agam_related_other_literature
File Size23 MB
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