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________________ संदृष्टि नं.9 अरिष्टा भाव{31} अरिष्टा - अरिष्ट । पृथ्वी का कथन वंशा पृथ्वी के ही समान है। केवल यहां पर कापोत लेश्या के स्थान पर नील लेश्या एवं कृष्ण लेश्या ग्रहण करना चाहिए। इसमें ! भाद होते . मस पृथ्वी में आदि के चार गुणस्थानों का सद्भाव जानना चाहिए। संदृष्टि इस प्रकार है - गुणस्थान भाव व्युच्छिति । भाव अभाव 2 मिथ्यात्व सासादन मित्र अविरत संदृष्टि नं. 10 मघवा-मघवी भाव (30) मधवी-माघवी - इन दोनों पृम्बियों का कथन भी वंशा पृथ्वी के ही समान है मात्र कापोत लेश्या के स्थान पर कृष्प्प लेश्या ग्रहण करना चाधिए । भाव ३० होते हैं। इस पृथ्वी में आदि के चार गुणस्थानों का सद्भाव जानना चाहिए। संदृष्टि इस प्रकार हैगुणस्थान | भाव व्युच्छिति | मिथ्यात्व अभाव सासादन मिक्ष अविरत (44)
SR No.090106
Book TitleBhav Tribhangi
Original Sutra AuthorShrutmuni
AuthorVinod Jain, Anil Jain
PublisherGangwal Dharmik Trust Raipur
Publication Year
Total Pages151
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Principle
File Size2 MB
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