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________________ गुणस्थान भाव ब्युच्छित्ति भाव अभाव सासादन] + (कुज्ञान 3, 129 (31- मिथ्यात्व, 9(उपरोक्त T+मिथ्यात्व, देवगति) गानाम्याचा अभटज) मिश्र 10 29 (29 पूर्वोक्त-3 १७ पूर्वोक्त + 3 कु कुज्ञान देवगति +3 ज्ञान देवगति - 3 मिश्रज्ञान अवधि मित्र ज्ञान, अवधि दर्शन) दर्शन) असंयत | 5(लेश्या 3, 132 (सम्यक्त्व 3, ज्ञान 6 (कुज्ञान 3, मिथ्यात्व, असंयम, 3.दर्शन , क्षयो. अमन्यत्व, देवगति) नरक गति) | लब्धि 5, नरकादि 3 गति, कषाय 4, लिंग 3, लेश्या , अज्ञान, असिद्धत्व, जीवत्व, भव्यत्व) ण हि णिरयगदी किण्हति सुक्क उवसमचरित्त तेउदुगे। खाइयदसणणाणं चरित्ताणिहुखइयदाणादी।।106) न हि नरकगतिः कृष्णत्रिकं शुक्ल उपशमचारित्रं तेजोद्विके | क्षायिकदर्शनज्ञानं चारित्रं हि क्षायिकदानादयः ॥ अन्वयार्थ - (तेजदुगे) पीत और पद्म लेश्या में (णिरयगदी) नरकगति, (किण्हति) कृष्णादितीन अशुभलेश्याये (सुक्क) शुक्ल लेश्या (उवसंमचरित्त) उपशम चारित्र (खाश्यदसणणाण) क्षायिक दर्शन, क्षायिक ज्ञान, (खाइयदाणादी)क्षायिक दानादिक (ण) नहीं (हुति) होते भावार्थ -पीत और पद्म लेश्या में नरकगति, कृष्णादि तीन अशुभ लेश्यायें, शुक्ल लेश्या, क्षायिक दर्शन, क्षायिक ज्ञान, क्षायिक चारित्र, क्षायिक दानादिक 5 लब्धिये भाव नहीं पाये जाते हैं। संदृष्टि नं. 75 पीत पद्म लेश्या भाव (39) पीत, पद्म लेश्या में 39 भाव होते है। जो इस प्रकार है - सम्यक्त्त्व 3, कुज्ञान 3, ज्ञान 4, वर्शन 3, क्षयो.लन्धि 5, · 3 गति (नरकगति रहित), कषाय , लिंग 3, लेश्या 2, संयमासंयम, सरागसंयम, मिथ्यात्व, असंयम, अज्ञान, असिद्धत्व, पारिणामिक भाव 3 | गुणस्थान आदि के सात होते है। संदृष्टि इस प्रकार है (127)
SR No.090106
Book TitleBhav Tribhangi
Original Sutra AuthorShrutmuni
AuthorVinod Jain, Anil Jain
PublisherGangwal Dharmik Trust Raipur
Publication Year
Total Pages151
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Principle
File Size2 MB
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