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________________ दान (लाई) लाम (मोग) भोग (उवभोग) उपभोग (च) और (वीरियं) वीर्य (एदे) ये पाँच क्षायोपशमिक भाव (जादा) होते है। ऐसा (णेया) जानना चाहिये। दसणमोहति हवे मिच्छ मिस्सत्त सम्मपडित्ती। अणकोहादी एदा णिद्दिट्ठा सत्तपयडीओ ॥४॥ दर्शनमोहमिति भवेत् मिथ्यात्वं मिश्रत्वं सम्यक्त्वप्रकृतिरिति। अनक्रोधादय एता निर्दिष्टाः सप्तकृतप्रकृतयः ।। सतण्ह उवसमदो उवसमसम्मो खयादु खझ्यो य । छ कु वसमदो सम्मत्तुदयादो वेदगं सम्मं ॥9॥ सप्तानामुपशमत उपशमसम्यक्त्व क्षयात्क्षायिकं च । षद्कोपशमतः सम्यक्त्वोदयात् वेदकं सम्यक्त्वं ॥ अन्वयार्थ 8-मेच्छा नियात्म मिस्तस, सन्यमिथ्यात्व (सम्मपडित्ती)सम्यक्त्व प्रकृति ये तीन(दसणमोहति) दर्शन मोहनीय की और (अणकोहादी) अनन्तानुबन्धी क्रोधादि चार (एदा) ये (सत्तपयडीओ)सात प्रकृतियां (णिट्टिा )कही गई है। इन (सतण्ह) सात के (उवसमदो) उवसम से (उवसमसम्मो) उपशम सम्यक्त्व (खयादु) क्षय से रखझ्यो) क्षायिक सम्यक्त्व(य) और (छक्कुवसमदो) छह के उपशम एवं(सम्मत्तुदयादो) सम्यक्त्व प्रकृति के उदय से (वेदगं) वेदक (सम्म) सम्यक्त्व (हवे) होता है। भावार्थ - मिथ्यात्व, सम्यग्मिध्यात्व, सम्यक्त्व प्रकृति तथा अनन्तानुबन्धी क्रोध, मान, माया, लोभ इन सात प्रकृतियों के उपशम से उपशमसम्यक्त्व होता है इनहीसातप्रकृतियों के क्षय से क्षायिक सम्यक्त्व तथा क्षयोपशम से क्षयोपशम सम्यग्दर्शन होता है। चारित्तमोहणीए उवसमदो होदि उवसमं चरणं । खयदो खइयं चरणं खओवसमदो सरागचारित्तं ॥10॥ चरित्रमोहनीयस्य उपशमतः भवत्युपशमं चरणं । क्षयतः क्षायिकं चरण क्षयोपशमतः सरागचारित्रे ।। अन्वयार्थ 10- (चारित्तमोहणीए) चारित्र मोहनीय के (उवसमदो) (5)
SR No.090106
Book TitleBhav Tribhangi
Original Sutra AuthorShrutmuni
AuthorVinod Jain, Anil Jain
PublisherGangwal Dharmik Trust Raipur
Publication Year
Total Pages151
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Principle
File Size2 MB
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