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________________ ज्ञानावरण और दर्शनावरण के त्याग से उन जिनेन्द्र के केवलज्ञान और केवलदर्शन उदय को प्राप्त हो जाते हैं। अनन्तसुखसम्भूतिर्जाता मोहारिसंक्षयात् । विप्लवादन्तरायस्य कर्मणोऽनन्तवीर्यता ॥७३१॥ मोह रूपी शत्रु के क्षय होने से अनन्त सुख की उत्पत्ति होती है। अन्तराय कर्म के विनाश से अनन्तवीर्यता हो जातो है। चराचरमिदं विश्वं हस्तस्थामलकोपमम् । प्रत्यक्षं भासते तस्य केवलज्ञान भास्वतः ॥७३२॥ उसे केवलज्ञान के प्रकाश से चराचर यह विश्व हाथ में रखे हुए आँवले की तरह प्रत्यक्ष प्रतिभासित होता है । विशुद्ध दर्शनं ज्ञातं चारित्रं भेदजितम् । प्रयक्तं समभूत्तस्य जिनेन्द्रस्यामितद्य तेः ॥७३३॥ समतायुक्त उन जिनेन्द्र के अपरिमितकान्ति के भेद से रहित दर्शन, ज्ञान और चारित्र अभिव्यक्त होते हैं । द्विकलं- . ... .. . . . प्रातिहाष्टिकोपेतः सर्वातिशयभूषितः।.. मुनिवृन्दैः समाराध्यो देवदेवाचितक्रमः ॥७३४॥ विहरन् सकलां पृथ्वी भष्यवृन्दान् विबोधयन् । कुर्वन् धर्मामृतासारं राजते देवसंसदि ॥७३५॥ १ वर्षा ।
SR No.090105
Book TitleBhav Sangrah
Original Sutra AuthorVamdev Acharya
AuthorRamechandra Bijnaur
PublisherBharat Varshiya Anekant Vidwat Parishad
Publication Year
Total Pages198
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Principle
File Size10 MB
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