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________________ भट्टारक रत्नकीति एवं कुमुदचन्द्र : व्यक्तित्व एवं कृतित्व एक बार तु जो पाछो वले तो किजे हास विलास । सखी सहुने भूमखे रमतो, फूलडा राडा मास्य ।। २ ।" कर जोडी ने वीनबू, वाल्हारथ पाछो बालि । जो श्रम मुन्हे बाडी जसे, ताहरे माथे चढस्ये गालि ॥ ३ ॥ रहे रहे रे यादवा जो डग भरे तो नेम । योवन वेशें एकली, घेर तुझ बिना रहु किम ॥ ४ ॥ रहे उभी जो पाशु बली, तु सांभलि सुन्दर वा रिण । श्रावे यादद मंडली तेहनी, जांण ह्यास्यु कारण ।। ५ ।। हवे प्रेम करी पाछावलो, हठ नुको नेम नरेन्द्र | दीन दयाल दया करो, इम बोले कुमुदचन्द ॥ ६ ॥ राग धन्यासी : ( २७ } 1 संगति कीजे रे साधु तणी वली, लीजे ते अरित नाम । जेह थी सीओ रे मन नू चींतव्यु जिम लहो अविचल ठाम ।। १ ।। जीवडा तुम करे सिमाहरु, माहरु मनस्यु विमांसी रे जोग । स्वारथ जोणी रे सह प्रावी मल्यु, लक्ष चोरासी रे जोनि भ्रमंतडा, इस जाणी रे तप जय की जोई, तन धन यौवन जीवन थिर नाहीं अंत समे नहीं कोय ॥ २ ॥ माणस जनम दुर्लभ । घडियन करिये विलंब || ३ || विघटी जास्ये सुजांग | ते माटइ करी सीख श्रह्मारडी पाल तो जिनवर प्रांण ॥ ४ ॥ पापज कोषां ते प्रति गहुआ, रड चड़िया संसार । कष्ट घणू करो, मूरख फोकम हार || ५ | रोहिली ते जाये जिन चंद | धर्म ज पायो रे जे दुखदोठा ते प्रति हवं है यास्यु रे धमंज कीजीये, जिस छूटो भव फंद ।। ६ ।। रामा रामा रे घन वन भखतो, पढियों तु मोहनी जाल । विषय विलूघो रे जिन गुण विसर्यो दिन दिन श्राने छे काल ॥ ७ ॥ सगा सह मेरे संग पर कारिम् सगो ते सही जिनराज । तेह नामइ थी रे त्रिसुख पामीर सरे ते जीवनू काज ॥ ८ ॥ जोता जोला रे जग गुरु भीमोयो तेहथी मरहसि दूरि । जनम मरण नाजिम दुख सहुटले, कहे कुमुदचन्द सूरि ॥ ६ ॥ r १८६
SR No.090103
Book TitleBhattarak Ratnakirti Evam Kumudchandra Vyaktitva Evam Kirtitva Parichay
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKasturchand Kasliwal
PublisherMahavir Granth Academy Jaipur
Publication Year
Total Pages269
LanguageHindi
ClassificationSmruti_Granth, Biography, & Story
File Size4 MB
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