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________________ अब्बुहल भाग । खरभाग भी चित्रा, वैडूर्य, लोहितांक प्रादि १६ प्रस्तारों में विभक्त है। प्रत्येक प्रस्तार १००० योजन मोटा है। उनमें चित्रानाम का प्रथम प्रस्तर अनेकों रत्नों व धातुमों को खान है। (दे. रत्नप्रभा)। तहां खर व पंक भाग में भाव नवासी देवों के भवन हैं और अब्युहल भाग में नरक पटल है, (दे. भवन ४/१) इसके अतिरिक्त तियक लोक में भी यत्र तत्र सर्वत्र उनके पूरे, भवन व प्रावास हैं। ... (दे. व्यंतर ४४१, ५) । (विशेष दे. भवन!४)। १०. ध्यन्तरलोक निर्देश चित्रा पृथ्वी के तल भाग से लेकर सुमेरु को चोटी तक तिर्यगलोक प्रमाण विस्तृत सर्व क्षेत्र व्यन्तरों के रहने का स्थान है। इसके अतिरिक्त खर पकभाग में भी उसके. भवन हैं। मध्य लोक के सर्व द्वीप समुद्रों को बेदिकामों पर, पर्वतों के कटों पर, नदियी के तटों पर इत्यादि अनेक स्थलों पर यथा योग्य रूप में उनके पुर, भवन व आवास हैं। (विशेष दे० व्यन्तर/४) । ११. मध्य लोक निर्देश १.द्वीप सागर ग्रादि निर्देश ति. प./५/--१०, २७, सनने दीवस मुद्दा संखादीदा भवंति समबट्टा । पढमो दीओ उवही चरिमो मज्झम्भि दीउवही । चित्तोवरि बहुमज्झ रज्जूपरिमाणदोहविक्खने। चेट्टति दोवउवहो एस्केक्क बेदिऊणं हु परिदो ।६। सब्वे विवाहिणीसा चित्तखिदि खंडिदूण चेटठति । वजनखिदोए उवरि दोवा वि हु उरि चित्ताए।१०। जम्बूदोवे लवणो उवही कालो त्ति घादईसंडे पवसेसा वारिशिही वतन्वा दीवस पणामा ।२८-१. सब द्वीप समुद्र असंख्यात एवं समवृत्त है। इनमें से पहला द्वीप, अन्तिम समुद्र और मध्य में द्वीप समुद्र हैं ।। चित्रा पृथ्वी के ऊपर बहुमध्य भाग में एक राजु लम्बे-चौड़े क्षेत्र के भीतर एक एक को चारों ओर से घेरे हुये द्वीप व समुद्र स्थित है। सभी समुद्र चित्रा पृथ्वी खण्डित कर वजा पृथ्वो के ऊपर, और सब द्वीप चित्रा. पृथ्वी के ऊपर स्थित है ।१०। (म् ग्रा/१०७६), २, जम्बूद्वीप में लवणोदधि मोर धातको खण्ड में कालोद नामक समुद्र है। शेष संमन्द्रों के नाम द्वीपों के नाम के समान ही कहना चाहिये। नि, सा/६ वज्जभय मूलभागा वेलुरियकया इरम्मा सिहरजदा। दीको वहोणमते पायारा होंति सम्वस्थ ।१६।सभी द्वोपब समुद्रों के अन्त में परिधि रूप से बडूपमयो वेदिका होता है, जिनका मूल ब्रजमयो होता है तथा जो रमणीक. शिखरों से संयुक्त हैं। [विशेष दे, लोक/३-४] मोट-(द्वीप समुद्रों के नाम व समुद्रों के जल का स्वाद–दे. लोक/५) भूमिविस्तार-४४३= मुखविस्तार:-=३ऊंचाई राजु० । सात स्थानों में ऊपर इक्कीस से विभक्त राजु को रख कर विस्तार के निमित्त भूत गुणकार को कहता हूं। एक सी पांच सतानवें, तिरानवें, चौरासी, तेरेपन, वनालीस और इक्कीस, ये उपयुक्त सात स्थानों में सात गुणाकार है। १२ ६ ,३६, रा.। . . . सात स्थानों में नीचे से ऊपर धनराजु को रखकर पनफल जानने के लिए गुणकार और भाग हारों को कहता हूँ। इन सात स्थानो में कम से दो सौ दो, पंचान, इक्कीस, बवानीस सौ सैतालीस, ग्यारह, चौदह सौ पंचानवें और नौ ये सात गुणकार हैं। तथा भागहार ग्रहां नौ, नौ, एक, बहत्तर एक, बहत्तर और चार हैं । २१२-124738+ +१३+8=१४७ राजु मन्दर क्षेत्र का घनफल । दूष्य क्षेत्र की बाहिरी उभय भुजाओं का पनफल चौदह से भाजित और तीन से गुणित लोक प्रमाण; तथा अभ्यन्तर दोनो भुजाओं का धनफल चौदह से भाजित और दो रो गुणित लोक प्रमाण है। दृष्य क्षेत्र में-३४३-१४४३७३१ बा, उ, भु, ध, फ, ३४३, १४४२४६ अ, क्षे, प, फ,। । इस दुष्य क्षेत्र के सब क्षेत्रों का घनफल चौदह से भाजित लोक प्रमाण है। अब यहां से आगे अनुकम से गिरिकट खण्ड को
SR No.090094
Book TitleBhagavana Mahavira aur unka Tattvadarshan
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDeshbhushan Aacharya
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages1014
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, Principle, & Sermon
File Size36 MB
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