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दिगंबर मुनि के महाव्रतों को धारण करके नग्नमुद्रा में सर्वत्र विहार करना प्रारम्भ कर दिया। उनका बिहार उत्तर भारत में मागरा तक हुआ प्रतीत होता है।
सन् १९२१ में एक अन्य दिगंबर मुनि श्री ग्रानन्दसागर जो का अस्तित्व उदयपुर (राजपुताना) में मिलता है ।थी ऋषभदेव केशरिया जी के दर्शन करने के लिए वहां गये थे; किन्तु कर्मचारियों ने उन्हें जाने नहीं दिया था। उस पर उपसर्ग माया जानकर वह ध्यान माढ़कर वहीं बैठ गये थे। इस सत्याग्रह के परिणाम-स्वरूप राज्य को पोर से उनका दर्शन करने देने की व्यवस्था हुई थी।
किन्तु इनके पहले दक्षिण भारत की ओर से श्री अनन्तकीतिजी महाराज का विहार उत्तर भारत को हरा था। वह प्रागरा, बनारस प्रादि शहरों में होते हुए शिखरजी की वंदना को गये थे। आखिर ग्वालियर राज्यान्तर्गत मोरेना स्थान में उनका असामयिक स्वंगवास माघ शुक्ला पंचमी सं० १६७४ को हुया था। जब वह ध्यानलीन थे तब किसो भात ने उसके पास ग्रागको अंगोठी रख दी थी । उस भाग से वह स्थान ही प्राग-मई हो गया और उसमें उन ध्यानारूढ़ मुनिजी का शरीर दग्ध हो गया। इस उपसर्ग को उन धीर वीर मुनिजो ने समभावों से सहन किया था। उनका जन्म सं०१९४० के लगभग निल्लीकार (कारकली में हया था। वह मोरेना में संस्कृत और सिद्धान्त का अध्ययन करने की नियत से ठहरे थे किन्तु अभाग्यवश वह अकाल कालकवलित हो गये।
श्री अनन्तकोतिजी के अतिरिक्त उस समय दक्षिण भारत में श्री चन्द्रसागरजी मुनि मणिहली, श्री सनत्कुमारजी मनि और श्री सिद्धसागरजी मुनि तेलवाल के होने का भी पता चलता है । किन्तु पिछले पाँच-छ वर्ष में दिगंबर मुनि मार्ग को विशेष वद्धि हुई है और इस समय निम्नलिखित संघ विद्यमान हैं, जिनके मुनिगण का परिचय इस प्रकार है :
(१) श्री शान्तिसागरजी का संघ यह संघ इस समय उत्तर में बहुत प्रसिद्ध था। इसका कारण यह है कि उत्तर भारत के कतिपय पण्डितगण इस संघ के साथ होकर सारे भारतवर्ष में घूमे थे । इस संघ ने अपना चातुर्मास भारत की राजधानी दिल्ली में व्यतीत किया था। उस समय इस संघ में दिगंबर-मुद्रा को धारण किए हुए सात मुनिगण और कई क्षुल्लक-ब्रह्मचारी थे। दिगम्बर साधनों में श्री शान्तिसागर ही मुख्य थे । सं० १९२८ में उनका जन्म बेलगाम जिले के ऐनापुर-भोज नामक ग्राम में हुमा था। शान्तिसागर जी को तब लोग सात गोंडा पाटील कहते थे । उनको नौ वर्ष की आयु में एक पांच वर्ष की कन्या के साथ उनका व्याह हया था। और इस घटना के ७ महीने के बाद ही वह बाल-पत्नी मरण कर गई थी। तब से वह बराबर ब्रह्मचर्य का अभ्यास करते रहे। उनका मन वैराग्य-भाव में मग्न रहने लगा ! जब वह अठारह वर्ष के थे, तब एक मुनिराज के निकट ब्रह्मचारी का पद उन्होंने ग्रहण किया था। सं० १९६६ में उत्तरग्राम में विराजरान दिगम्बर मुनि श्री देवेन्द्रकीतिजी के निकट उन्होंने क्षुल्लक का व्रत ग्रहण किया था। इस घटना के चार वर्ष बाद संवत् १९७३ में कुभोज के निकट बाहुबलि नामक पहाड़ी पर स्थित श्री दिगम्बर मूनि प्रकलीक स्वामी के निकट उन्होंने ऐलकपद धारण किया था। सं० १९७३ में येरनाल में पंचकल्याणक महोत्सव हा था। उसमें वह भी गये थे। जिस समय दीक्षाकल्याणक महोत्सव सम्पन्न हो रहा था, उस समय उन्होंने भोसगी के निग्रंथ मुनि महाराज के निकट मनिदीक्षा ग्रहण की थी । तब से वह बराबर एकान्त में ध्यान और तप का अभ्यास करते रहे थे। उस समय वह एक खासे तपस्वी थे। उनकी शान्त मनोवृत्ति और योगनिष्ठा ने उत्तर भारत के विद्वानों का ध्यान उनकी ओर आकृष्ट किया। कई पंडित उनकी संगति में रहने लगे। अाखिर उनके शिष्य कई उदासीन धावक हो गये; जिनमें से कतिपय दिगम्बर मुनि
और ऐलक क्षुल्लक के व्रतों का पालन करने लगे। इस प्रकार शिष्य समुह से वेष्टित होने पर उन्हें 'प्राचार्य' पद से सुशोभित किया गया और फिर वम्बई के प्रसिद्ध सेठ घासी राम पूर्णचन्द्र जौहरो ने एक यात्रा-संघ सारे भारत के तीर्थों की वन्दना के लिये निकालने का विचार किया। तदनुसार आचार्य शान्तिसागर की अध्यक्षता में वह संघ तीर्थयात्रा के लिए निकल पड़ा। महाराष्ट्र के सांगली-मिरज प्रादि रियासतों में जब यह संघ पहुंचा था तब वहाँ के राजानों ने उसका अच्छा स्वागत किया था । निजाम सरकार ने भी एक खास हुकुम निकाल कर इस संघ को अपने राज्य में कुशलपूर्वक विहार कर जाने दिया था । भोपाल राज्य
१, Ibid. P. 18-20 २. दिज, वर्ष १४ अंक ५-६ पृष्ठ ७ ३. दिल, विशेषांक कीर निसं० २४४३ ४. दिजैन, वर्ष १६ प्रक१-२ पृ०९ ५. हुकुम नं० ६२८ (शोगे इंतजामी) १३३७ 'कसली
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