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________________ खि २५ जनलोक २८ . . हस्पति सामान्य लोक पथ्वी तल और जल के नीचे रौरव, सूकर रोध, सत्य लोक साल, विशसन, महाज्वाल, लोयान्तिक देवा तप्तकुम्भ, लवण, विलो१२००.००.००० यो. 19मर हित रुधिररम्मा, वैतरणी, क्रमीश, कृमि भोजन, असि पत्र, बन, कृष्ण लीला, भक्ष १००.00.000 मो. LAसादि] दारुण, पूयवह, पाप, वहिण ज्वाल, अघःशिरा, संदेश, कालसूत्र, तमस, अवोचि, श्वभोजन, अप्रतिष्ठ, ओर, २००,००.००० मो. अरुचि, आदि महा भयंकर ए ... . . . | महलाक नरक हैं। जहां पापी जीव १००.००,००० यो. मदिरा मरकर जन्म लेते हैं। भूमि में एक लादा योजन ऊपर जाकर एक-एक लाख योजन सन्त Eि के अन्तराल से सूर्य, चन्द्रमा २००.000 वनक्षत्र, मंडल स्थित हैं। 9. 0:0 0 शनि तथा इनके ऊपर दो-दो लाख | 200.०००यो. योजन के अन्तराल' से बुध, शुक्र, मंगल, बृहस्पति, शनि, | 200.000 मो० तथा इसके ऊपर एक-एक मल लाख योजन के अन्तराल से सप्तऋष व ध्रुव तारे स्थित 20०.००० यो. हैं। इससे एक करोड़ योजन ऊपर महलोक हैं जहाँ कल्पों | 200.०००यो तक जीवित रहने वाले 200.०००मोर कल्पवासी भृग प्रादि सिद्ध गण रहते हैं। इससे दो करोड़ योजन ऊपर अनली चन्द्र है जहाँ ब्रह्मायों के पुत्र सन OTHmin कादि रहते हैं 1 पाठ करोड़ योजन ऊपर सत्य लोक है। पुर्वः लोक भूलोक जहां वैराज देव निवास करते हैं। १२ करोड़ योजन ऊपर सवलोक हैं। जहां फिर से मरने वाले जीव रहते हैं, इसे ब्रह्म लोक भी ।। | 1| २महा जवाब कहते हैं । भूलोक स्वर्गलोक के मध्य में मुनिजनों से 1I.LLIT सेवित भुवलोक है और सुर्च I ।।। ३लवण तथा प्रव के बीचों बीच में हैं। १४ लाख योजन स्वर्ग IIIIIIIIIIIIIIIITTETITITIATTTTTTTTTTTTTTTHIMIMMIS4तरणी लोक कहलाता है। ये तीनों लोक कृतक हैं। जनलोक, TAI TATLILI MIMICTIOTTITAUTIE || UTI CHIMIT कृतलोक, तपलोक व सत्यलोक ये योजन तक हैं। इन INDIELUMUJURNIRITJJIHO NLUNDE HAR दोनों कृतक व अकृतके मध्य में महलोक हैं । इसलिये यह वि चि । कृताकृतक है। म सर्थ १००.००० जरलोक मसि पावन ४४
SR No.090094
Book TitleBhagavana Mahavira aur unka Tattvadarshan
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDeshbhushan Aacharya
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages1014
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, Principle, & Sermon
File Size36 MB
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