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और पुरुष सुरु भतः कौर, भाई, ही की कथा मनः।। पार वस्तु शुभ दायक होई, सत्यवन्त जानो भवि सोई ।।८।। जिनबरसूत्र सु श्रीता कोय, पूरव अपर विरोधी होय । शृंगादि करण भव सुवख, पापकारिगो दाइक दुवस्त्र ।।६।।
दोहा इत्यादिवः श्रोता तनै लच्छन कहे प्रतेक । सम्यक् बुधि निश्चय त्रयों, कन्यो, चरित गुन नक ।।८।।
अरिल्ल वर्धमान जिन चरित जु थेणिक बुझियो । थी मुख्य वाणी भई अनक्षर गुझियो ।। तब गौतम गनराय, नाति प्रतिभासियो । सकल सभा हरपंत, जगत परिकासियो ।८।। सकल कौति मुनिराज, संस्कृत रचत । ताकी ले अनुसार, को भाषा अवै।। सिगई देवाराइ, खटोला पुर ठए । तिन सुत प्रथमहि "नवल" पंच गुरुपद नए ||
कवि लघुता
सबैया जंगे नर पंग कोई मेरु शिखा चहिवेकों, वावन ही कहे दधिको तो भुज नरिहीं। बाल जलमध्य शशिविम्ब देखि गयो चाहै। मूरख तो कहै अंग पूर्व पार धरिहौं । क्रोधवंत केहिरि को देखत गयंद भजे, तासौं मृगि वीरजविहीन कहै लहिहौं। तस यह ग्रंथको आरम्भ कियो अल्पवद्धि, गनी कोई हर मोहि ऐसो नहि उरिहौं ।।
दोहा जिनवाणी सागर अगम, पार न कोई लहेई । मति भाजन जेकौं जितौं, तेतौं भर भर लेइ ॥६॥ मधरवचन कोकिल कहै, प्रामकली चखि पाए । जैसे, ग्रन्थ कही किमपि, जिनवानी परताप ।।१२।।
गीतिका छन्द
इमि भांति इष्ट देवता, सब जोरि कर तिनि पद नम्यौं । निज परम गुण जुन वक्त आदिक, तारा भनि दोष न बम्यौं ।। जिनराज मुख सम्यक कथा, शुभ धर्म खानि सुजानियों। चरम जिनपति चरित निरमल, करम शान्त बखानियों ||३|| वीरत वर दीर गुननिधि, वीर विधि इति हों सही। वीर प्रभु जगधीर जिनवर सासते पद को लही । वीर गन अति बुद्धि सुन्दर, यहै जस अब लीजिये। निज भक्ति हय धर करहु वीनति, बीर गन मुहि दीजिए ||४||
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