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________________ ३. नन्दीश्वर के पर्वत विस्तार रा.वा.1३1३५ नाम ऊंचाई | गहराई ति. प. 1५1गा. पृ०ाप. ह.पु. ॥५गा. : त्रि. सा. ।गा । मूल मध्य ऊपर यो । यो. यो. यो. ८४००० ५४००० ८४००० ८४००० १६८८ अंजनगिरि दधिमुख रतिकर १०,००० १००० १०,००० | १६८।८ । ६५२ / ९६८ ६५ | १६८।२५ / ६७० . , १९१1३१ ६७४ , १००० १००० १००० ६८ !: : उपरिम पृथ्वी की उत्कृष्ट आयु को नीचे की पृथ्वी की उत्कृष्ट आयु में से कम करके शेष अपने-अपने इन्द्रकों की संख्या का भाग देने पर जो लब्ध आवे, उलना विधक्षित पृथ्वी में आयु की हानि-वृद्धि का प्रमाण जानना चाहिये। उदाहरण—वि. उ. आयु सा. ३-१-११== द्वि. पृ. में आयु की हा. बृ. । द्वितीय पृथ्वी के ग्यारह इन्द्रकों में से प्रारह से भाजित तेरह (11) सागरोग्म प्रमाण उत्कृष्ट आय है। इसमें तेतीस (18) प्राप्त होने तक ग्यारह से भाजित दो दो (३१) को मिलाने पर क्रमशः द्वितीय पृथ्वी के शेष द्वितीपादि इन्द्रकों की उत्कृष्ट आयु का प्रमाण होता है। स्तनक-इ.१३, त. १. म.१७, व. पा. २१, सं.२३, जिह्वा ३६, जिह्वक २१, लोल लोलक ३१. स्त. लो. सा. तृतीय पृथ्वी में नौ से भाजित इकतीस (11) सागरोपम प्रभघ या आदि है। इसके आगे प्रत्येक पटल में नौ से भाजित चार की (8) की तिरेसठ (12) तक वृद्धि करने पर उत्कृष्ट आयु का प्रमाण होता है। तप्त-है , शी. ३५, तपन , तापन , नि, ४७, प्रज्व १२, उज्व ५५ संज्व. १६, संप्रज्व. सा. चतुर्ष पुथ्वी में सात से भाजित बावन सागरोपम प्रभाव है। इसके आगे प्रत्येक पटल में सत्तरपर्यन्त सात में भाजित तीन (3) को वृद्धि करने पर उत्कृष्ट आयु का प्रमाण निकलता है। आर--४२, मार ५५, तार ५८, चर्चा ३, तमक , वाद ३७, रव स्व . सा. । पांचवीं पृथ्वी में पांच से भाजित सत्ताधन सागरोपम आदि है। अनन्तर प्रत्येक पटल में पचासी तक पांच में भाजित सात सात (७) के जोड़ने पर उत्कृष्ट आयु का प्रमाण जाना जाता है। तमक -११, भ्र४, झ , अंघ,ति..ता.। मघवी पृथ्वी के तीन पटलों में नारकियों की उत्कृष्ट प्रासु क्रम से तीन से भाजित छप्पन, इकसठ और छयासठ सागरोपम है। हिम. १७, बर्दल , लल्लक सा.। सातवीं पृथ्वी के जीवों की आयु तेतीस सागरोपम प्रमाण है। ऊपर अपर के पटलों में जो उत्कृष्ट आयु है, उसमें एक समय मिलाने पर वही नीचे के पटलों में जघन्य प्रायु हो जाती है। __ अवधिस्थान ३३ सा. इस प्रकार सातों पच्चियों के प्रत्येक इन्द्रक मैं जो उत्कृष्ट मायु कही गई है, वही यहां के श्रेणीबद्ध और विश्रणीगत प्रकीर्णक बिलों की भी आयु समझना चाहिये। इस प्रकार आयु का वर्णन समारत हुआ। १६४
SR No.090094
Book TitleBhagavana Mahavira aur unka Tattvadarshan
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDeshbhushan Aacharya
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages1014
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, Principle, & Sermon
File Size36 MB
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