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________________ -मेष की परिधियां-- नीचे से ऊपर की ओर इस पर्वत की परिधि सात मुख्य भागों में विभाजित है-हरितालमयी, वैड्यमयी, सर्वरत्नमयी, वचमयी, मद्यमयी और पद्ममयी पौर पद्मरागमयी अर्थात् लोहिताक्षमयो। इन छहों में से प्रत्येक १६५०० योजन ऊंची है। भूमितल अवगाही सप्त परिधि (पृथ्वी उपल' बालुका ग्रादि रूप होने के कारण) नाना प्रकार है। दूसरी मान्यता के अनुसार ये सातों परिथियां क्रम से लोहिताक्ष, पद्म, तपनीय, बंदर्य, वज्र, हरिताल और जाम्ब नद-सुवर्णमयी हैं। प्रत्येक परिधि की ऊंचाई १६५०० योजन है। पृथ्वी तल के नीचे १००० योजन पृथ्वी, उपल बालुका और शर्करा ऐसे चार भाग रूप हैं। तथा ऊपर चूलिका के पास जाकर तोम काण्डकों रूप है। प्रथम काण्डक सर्वरत्नमयी, द्वितीय जाम्बूनदमयी और तीसरा काण्डक चूलिका का है जो बंडूर्यमयी है। ४-वनखण्ड निर्देश १-सुमेरु पर्वत के तल भाग में भद्रशाल नाम का प्रथम वन है जो पांच भागों में विभक्त है-भद्रशाल, मानुषोत्तर, देवरमण, नागरमण और भुतरमण। इस वन को चारों दिशाओं में चार जिन भवन हैं। इनमें से एक मेरु से पूर्व तथा सीता नदी के दक्षिण में है। दूसरा मेस की दक्षिण व सीतादा के पूर्व में है। तोसरा मेरु से पश्चिम तथा सीतोदा के उत्तर में है और चौथा मेरुं के उत्तर व सीता के पश्चिम में है। इन चैत्यालयों का विस्तार पाण्डक वन के चैत्यालयों से चौगुना है। इस वन में मेर को चारों तरफ सीता व गीतोना नदी के दोनों तटों पर एक-एक करके पाठ दिग्गजेन्द्र पर्वत हैं। २-भद्रशाल बन से ५०० योजन ऊपर जाकर मेरु पर्वत की कटनी पर द्वितीय वन स्थित है। इसके दो विभाग हैंनन्दन व उपनन्दन । इसकी पूर्वादि चारों दिशाओं में पर्वत के पास क्रम से मान, धारण, गन्धर्व द चित्र नाम के चार भवन हैं जिन में कम से सौधर्म इन्द्र के चार लोकपाल सोम, यम, वरुण व कुबेर क्रीड़ा करते हैं। कहीं-कहीं इन भवनों को मुफानों के रूप में बताया जाता है। यहां भी मेरु के पास चारों दिशाओं में चार जिन भवन हैं। प्रत्येक जिन भवन के प्रागे दो-दो कूट हैंजिन पर दिक्कुमारी देवियों रहती हैं। ति. प. की अपेक्षा से पाठ कट इस वन में न होकर सौमनस वन में है। चारों दिशाओं में सौमनस वन की भांति चार-चार करके कूल १६ पुष्करिणियां हैं। इन बन की ईशान दिशा में एक बलभद्र नाम का कूट है जिसका कथन सौमनस वन के बलभद्र कूट के समान है। इस पर बलभद्र देव रहता है। ३-नन्दन वन से ६२५०० योजन ऊपर जाकर सुमेरु पर्वत पर तीसरा सौमनस वन स्थित है । इसके दो विभाग इस सनको कट्टा मिलाने पर निम्न प्रकार कुन घनफल होता है। ४२००००। ७८००० . ११४००००.१५ २५८००००४२० ४६ १०९२०००००:४६ ४६ इस प्रकार बानावरुद्ध क्षेत्र के घाफत का वर्णन समाप्त हुआ। आठ परिक्षयों में से प्रत्येक पृथ्वी के परफल को संक्षेप में कहते हैं इनमें से प्रथम पृथ्वो एक राजु विस्तृत, सात राज लंबी, और बीस हजार कम दो लास, अर्थात् एक लाख अस्सी हजार योजन मोटो है । इसका घनफल अपने वाहत्य (१०००० यो०) के सातवे भाग बाल प्रमाण जगनतर होता है। ७४१८००००४७,१८००००x४६ १४७१८००००/ दुपरी पृथ्वी सातों भाग कम दो राज विस्तार बाली सात राजु आयत और बत्तीस हजार योजन मोटी है। इसका धनफल चार लाख सौरह हजार योजन व उमंचासवें भाग बाहत्य प्रमाण जगातर है। ७.३२००० ७X४१६०००४७४१६०००x४६
SR No.090094
Book TitleBhagavana Mahavira aur unka Tattvadarshan
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDeshbhushan Aacharya
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages1014
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, Principle, & Sermon
File Size36 MB
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